भारत की चांदी! रूस, वेनेजुएला और अमेरिका को छोड़ अब इन देशों से आ रहा है भर-भरकर तेल, क्या कम होंगे पेट्रोल के दाम?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल खरीदार और उपभोक्ता देश है. हमारी अर्थव्यवस्था और दैनिक यातायात पूरी तरह से तेल के सुचारू आयात पर निर्भर है. पिछले कुछ समय से देश की रिफाइनरियों में सबसे ज्यादा रूसी तेल रिफाइन हो रहा था लेकिन अब हवा का रुख पूरी तरह से बदल गया है. अमेरिकी व्यापार समझौते के बाद भारत सरकार ने अपनी तेल खरीद की रणनीति में एक बड़ा बदलाव किया है. इकोनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अब भारतीय बंदरगाहों पर रूस के बजाय ओपेक (OPEC) देशों, विशेषकर सऊदी अरब के तेल टैंकरों की कतारें लगनी शुरू हो गई हैं. जानकारों का कहना है कि अगर OPEC देशों से तेल सही दाम पर मिलता है, तो भारत में डीजल और पेट्रोल के दाम में हल्की नरमी देखने को मिल सकती है.
रूस से क्यों कम हो रही है तेल की खरीदारी?
साल 2022 में जब रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध छिड़ा, तो पश्चिमी देशों ने मॉस्को पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए. उस वक्त भारत ने आम जनता की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए सस्ते रूसी तेल की जमकर खरीदारी की थी. एक समय ऐसा था जब भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी महज एक फीसदी हुआ करती थी, जो युद्ध के बाद छलांग लगाकर करीब 40 फीसदी तक पहुंच गई और रूस हमारा सबसे बड़ा सप्लायर बन गया. हालांकि, अब हालात बदल चुके हैं. पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और अमेरिका के साथ हुए नए व्यापार समझौते के दबाव के कारण भारतीय तेल कंपनियों ने रूस से किनारा करना शुरू कर दिया है. जनवरी 2026 में रूस से भारत का तेल आयात घटकर लगभग 1.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया है. यह नवंबर 2022 के बाद का सबसे निचला स्तर है. कुल आयात में भी रूस की हिस्सेदारी सिकुड़कर 21.2 प्रतिशत पर आ गई है और यह पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में एक-तिहाई कम है.
सऊदी अरब की फिर से नंबर वन पर वापसी
रूसी कच्चे तेल की घटती मांग के बीच मध्य पूर्व के देशों ने एक बार फिर भारतीय बाजार पर अपनी मजबूत पकड़ बना ली है. सऊदी अरब ने फिर से भारत के सबसे बड़े तेल आपूर्तिकर्ता का ताज पहन लिया है. फरवरी के महीने में सऊदी अरब से होने वाला आयात अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. आंकड़ों पर नजर डालें तो दिसंबर की शुरुआत में रूस से आयात 10 महीने के निचले स्तर 2.7 बिलियन डॉलर पर था, जो दिसंबर 2024 के मुकाबले 15% कम था. इसके विपरीत, इसी दौरान सऊदी अरब से तेल की खरीद में 60 फीसदी का भारी उछाल देखा गया और यह 1.8 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई. अमेरिका से भी तेल खरीद में 31 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इस पूरी कवायद में ओपेक देशों का भारत के कच्चे तेल के बाजार में दबदबा पिछले 11 महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है.
रूस के तेल का अब सबसे बड़ा ग्राहक कौन?
जैसे-जैसे भारत ने रूसी तेल से दूरी बनाई है, चीन ने इस स्थिति का पूरा फायदा उठाया है. नवंबर के बाद से समुद्री मार्ग से रूसी कच्चे तेल की खरीदारी में चीन ने भारत को पीछे छोड़ दिया है और वह इसका दुनिया में सबसे बड़ा खरीदार बन गया है. वोर्टेक्सा एनालिटिक्स के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, फरवरी में चीन को रूस से रोजाना करीब 2.07 मिलियन बैरल तेल भेजे जाने का अनुमान है. यह जनवरी के 1.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन के अनुमान से काफी अधिक है.
अब रूस से बिल्कुल नहीं लिया जाएगा तेल?
बाजार के जानकारों और विश्लेषकों का मानना है कि रूस से आने वाले तेल के आयात में अभी और गिरावट दर्ज की जाएगी. अनुमान है कि फरवरी में यह आंकड़ा औसतन 1 से 1.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहेगा. वहीं, मार्च के महीने में इसके और भी ज्यादा घटकर लगभग 8,00,000 बैरल प्रतिदिन तक पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही है. हालांकि, मौजूदा व्यावसायिक परिस्थितियों को देखते हुए यह साफ है कि रूस से तेल की सप्लाई रातों-रात पूरी तरह से बंद नहीं होगी, बल्कि यह एक क्रमिक प्रक्रिया के तहत धीरे-धीरे कम होती चली जाएगी.