क्या महिलाएँ दिनदहाड़े सुरक्षित हैं ?
मनीषा हत्याकांड और महिला सुरक्षा
भिवानी में मनीषा हत्याकांड (11-13 अगस्त 2025) एक दुखद उदाहरण है, जो यह सवाल उठाता है कि क्या महिलाएँ दिनदहाड़े सुरक्षित हैं। मनीषा, एक 18-19 वर्षीय शिक्षिका, सुबह घर से स्कूल और नर्सिंग कॉलेज के लिए निकली थी, लेकिन उसका शव दो दिन बाद नहर के किनारे मिला। शुरुआती आशंकाएँ हत्या और दुष्कर्म की थीं, लेकिन पुलिस ने बाद में इसे आत्महत्या बताया। इस मामले ने कई सवाल खड़े किए:
- पुलिस की लापरवाही: मनीषा की गुमशुदगी की शिकायत (11 अगस्त) को पुलिस ने गंभीरता से नहीं लिया और कहा कि वह “किसी के साथ भाग गई होगी”। अगर तुरंत कार्रवाई होती, तो शायद उसकी जान बच सकती थी।
- दिनदहाड़े अपराध: मनीषा दिन के समय गायब हुई, जो दर्शाता है कि सार्वजनिक स्थानों पर भी महिलाएँ असुरक्षित हो सकती हैं।
- सामाजिक तनाव: परिजनों और ग्रामीणों का आक्रोश, विरोध प्रदर्शन, और सीबीआई जांच की मांग इस बात का संकेत है कि लोग कानून-व्यवस्था पर भरोसा खो रहे हैं।
यह घटना दिखाती है कि दिन के उजाले में भी, जब एक युवती अपने रोज़मर्रा के काम (स्कूल या कॉलेज जाना) के लिए निकलती है, वह जोखिम में हो सकती है।
भारत में महिलाओं की सुरक्षा: वर्तमान स्थिति
महिलाओं की सुरक्षा भारत में एक जटिल और गंभीर मुद्दा है। दिनदहाड़े भी महिलाएँ कई तरह के खतरों का सामना करती हैं। कुछ महत्वपूर्ण बिंदु और तथ्य:
1. अपराध के आँकड़े
- राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) 2022 (नवीनतम उपलब्ध डेटा):
- भारत में 2022 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 4,45,256 मामले दर्ज हुए, जो 2021 की तुलना में 4% अधिक है।
- हर दिन औसतन 86 दुष्कर्म के मामले और 1,200 छेड़छाड़ के मामले दर्ज होते हैं।
- हरियाणा में महिलाओं के खिलाफ अपराध की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है (147 प्रति लाख जनसंख्या, राष्ट्रीय औसत 66.4)।
- दिनदहाड़े अपराध: कई मामले, जैसे दिल्ली में 2012 का निर्भया कांड, कोलकाता में 2024 का RG कर मेडिकल कॉलेज दुष्कर्म-हत्या, और भिवानी में मनीषा का मामला, दिन के समय हुए। NCRB के अनुसार, 40% से अधिक दुष्कर्म और छेड़छाड़ की घटनाएँ दिन के समय (6 AM से 6 PM) होती हैं।
2. हाल की घटनाएँ
- कोलकाता RG कर मेडिकल कॉलेज कांड (9 अगस्त 2024): एक 31 वर्षीय डॉक्टर की अस्पताल परिसर में दुष्कर्म और हत्या ने देश को झकझोर दिया। यह घटना रात में हुई, लेकिन यह दर्शाती है कि कार्यस्थल पर भी महिलाएँ असुरक्षित हैं।
- गुरुग्राम में फायरिंग (17 अगस्त 2025): भिवानी से कुछ ही दूरी पर, गुरुग्राम में यूट्यूबर एल्विश यादव के घर के बाहर फायरिंग और फाजिलपुरिया के सहयोगी की हत्या (जुलाई 2025) जैसी घटनाएँ हरियाणा में बढ़ते अपराध को दर्शाती हैं, जो महिलाओं के लिए भी खतरा बढ़ाता है।
- पुणे में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की हत्या (जुलाई 2025): एक 26 वर्षीय महिला की दिनदहाड़े हत्या ने महाराष्ट्र में भी सुरक्षा पर सवाल उठाए।
3. सामाजिक और सांस्कृतिक कारक
- लैंगिक असमानता: भारत में पितृसत्तात्मक मानसिकता और लैंगिक रूढ़ियाँ महिलाओं को असुरक्षित बनाती हैं। सार्वजनिक स्थानों पर छेड़छाड़, घूरना, और टिप्पणियाँ आम हैं।
- पुलिस और कानूनी व्यवस्था: पुलिस की लापरवाही (जैसे मनीषा के मामले में), धीमी जांच, और कम सजा दर (NCRB 2022: दुष्कर्म मामलों में सजा दर केवल 27%) अपराधियों को प्रोत्साहित करती है।
- सार्वजनिक स्थानों की असुरक्षा: बस स्टॉप, बाजार, और यहाँ तक कि स्कूल-कॉलेज जैसे स्थान भी असुरक्षित हो सकते हैं।
महिलाएँ दिनदहाड़े सुरक्षित क्यों नहीं हैं?
- पुलिस की निष्क्रियता:
- मनीषा के मामले में, पुलिस ने गुमशुदगी की शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया। कई मामलों में, पुलिस पहले पीड़िता के चरित्र पर सवाल उठाती है, जिससे जांच में देरी होती है।
- हरियाणा में पुलिस बल की कमी (2023 में 20% पुलिस पद खाली) और अपर्याप्त प्रशिक्षण भी एक कारण है।
- सार्वजनिक स्थानों में सुरक्षा की कमी:
- सीसीटीवी कैमरों की कमी: मनीषा के मामले में कॉलेज के सीसीटीवी 30 जुलाई से बंद थे, जिससे सुराग नहीं मिले।
- खराब स्ट्रीट लाइटिंग और गश्त: ग्रामीण और उपनगरीय क्षेत्रों में रात में ही नहीं, दिन में भी गश्त कम होती है।
- भीड़भाड़ वाले क्षेत्र: बाजारों और बस स्टैंड्स पर छेड़छाड़ की घटनाएँ दिन में भी आम हैं।
- सामाजिक मानसिकता:
- महिलाओं को अकेले बाहर निकलने पर “जिम्मेदार” ठहराया जाता है, जिससे अपराधियों को सामाजिक समर्थन मिलता है।
- मनीषा जैसे मामलों में, परिवार को “लड़की को बाहर क्यों भेजा” जैसे सवालों का सामना करना पड़ता है।
- कानूनी ढील:
- अपराधियों को तुरंत सजा न मिलना और जमानत पर छूट जाना अपराध को बढ़ावा देता है।
- उदाहरण: मनीषा मामले में अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई, जिससे परिजनों का गुस्सा बढ़ा।
क्या किया जा रहा है?
सरकार, पुलिस, और समाज ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए कुछ कदम उठाए हैं, लेकिन ये पर्याप्त नहीं हैं:
- कानूनी उपाय:
- निर्भया एक्ट (2013): दुष्कर्म और यौन हिंसा के लिए सख्त सजा (7 साल से लेकर उम्रकैद तक)।
- पॉक्सो एक्ट: नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों के लिए सजा।
- शक्ति ऐप: हरियाणा में महिलाएँ आपात स्थिति में शक्ति ऐप के जरिए पुलिस को बुला सकती हैं, लेकिन इसका उपयोग सीमित है।
- पुलिस सुधार:
- मनीषा मामले के बाद भिवानी एसपी का तबादला और 4 पुलिसकर्मियों का निलंबन हुआ।
- दिल्ली और हरियाणा में कुछ क्षेत्रों में महिला पुलिस गश्त बढ़ाई गई है।
- सामाजिक पहल:
- महिला संगठन और एनजीओ (जैसे सायली, जागोरी) जागरूकता अभियान चला रहे हैं।
- स्कूल-कॉलेजों में आत्मरक्षा प्रशिक्षण शुरू हुआ है।
- तकनीकी समाधान:
- सीसीटीवी और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स के तहत दिल्ली, गुरुग्राम जैसे शहरों में कैमरे लगाए जा रहे हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में यह सुविधा कम है।
- हेल्पलाइन नंबर (112, 181) और ऐप्स की उपलब्धता।
क्या करना चाहिए?
महिलाओं को दिनदहाड़े सुरक्षित बनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:
- पुलिस सुधार:
- गुमशुदगी की शिकायतों को तुरंत गंभीरता से लें।
- महिला पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ाएँ और संवेदनशीलता प्रशिक्षण दें।
- सार्वजनिक स्थानों में सुधार:
- सभी स्कूल, कॉलेज, और सार्वजनिक स्थानों पर कार्यशील सीसीटीवी और लाइटिंग अनिवार्य करें।
- दिन और रात में नियमित पुलिस गश्त बढ़ाएँ।
- जागरूकता और शिक्षा:
- स्कूलों में लैंगिक समानता और सम्मान की शिक्षा दें।
- पुरुषों और समाज में महिलाओं के प्रति मानसिकता बदलने के लिए अभियान चलाएँ।
- तेज़ न्याय:
- फास्ट-ट्रैक कोर्ट में यौन अपराधों के मामलों की सुनवाई जल्दी करें।
- सजा दर बढ़ाने के लिए पुलिस और फोरेंसिक जांच को मजबूत करें।
- सामुदायिक भागीदारी:
- खाप पंचायतों और स्थानीय नेताओं को महिलाओं की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार बनाएँ।
- मनीषा जैसे मामलों में समुदाय की आवाज को सुना जाए।
मनीषा हत्याकांड और इसी तरह की अन्य घटनाएँ (जैसे कोलकाता RG कर कांड) दर्शाती हैं कि भारत में महिलाएँ दिनदहाड़े भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। पुलिस की लापरवाही, सामाजिक मानसिकता, और अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा इसके प्रमुख कारण हैं। हालाँकि, सरकार और समाज ने कुछ कदम उठाए हैं, लेकिन इनमें और सुधार की जरूरत है। मनीषा के मामले में, परिजनों की सीबीआई जांच की मांग और सामाजिक आक्रोश इस बात का सबूत है कि लोग बदलाव चाहते हैं। महिलाओं की सुरक्षा के लिए न केवल कानून, बल्कि सामाजिक जागरूकता और त्वरित कार्रवाई जरूरी है।
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