IND vs SL: श्रीलंका की पिचों पर क्यों फेल हो जाता है भारत वाला स्पिन फॉर्मूला? ऐसे मिलते हैं विकेट

India vs Sri Lanka Test Series: भारतीय टीम इस समय श्रीलंका के दौरे पर है, जहां 15 अगस्त से 2 टेस्ट मैचों की सीरीज खेली जानी है. इस सीरीज में स्पिन गेंदबाजों की अहम भूमिका रहने वाली है. श्रीलंका की टर्निंग पिचों पर स्पिन गेंदबाजों का हमेशा से दबदबा रहा है. हालांकि, सिर्फ गेंद का टर्न होना ही गॉल के मैदान पर सफलता की गारंटी नहीं होता. आंकड़ों से यह साफ होता है कि उपमहाद्वीप के बाकी देशों की तुलना में श्रीलंकाई परिस्थितियों में वही स्पिनर सबसे ज्यादा कामयाब होते हैं, जो अपनी गेंद की रफ्तार को थोड़ा धीमा रखते हैं और लेंथ को आगे की ओर पिच करते हैं.
भारत से कितनी अलग है श्रीलंका की पिच?
भारत और बांग्लादेश की तुलना में श्रीलंका में स्पिनरों को सफलता पाने के लिए अलग तरह से गेंदबाजी करनी पड़ती है. श्रीलंकाई पिचों पर स्पिनरों के लिए ज्यादा उछाल मौजूद रहता है. जब गेंद में बाउंस ज्यादा होता है, तो स्पिनर ओवरस्पिन का सहारा लेते हैं, जिससे गेंद हवा में अपने आप थोड़ी धीमी हो जाती है. इसके कारण स्लिप, गली, शॉर्ट लेग और सिली प्वाइंट पर कैच छूटने के मौके ज्यादा बनते हैं. जिसके चलते गेंदबाजों को धीमी गति के साथ-साथ लेंथ को आगे भी रखना पड़ता है.
साल 2020 के बाद से आंकड़ों पर नजर डालें तो श्रीलंका में स्पिनरों की औसत गति लगभग 83 किमी/घंटा रही है, वहीं भारत में यह 89 किमी/घंटा के आसपास रहती हैय इसके अलावा, श्रीलंका में गेंद को थोड़ा आगे टप्पा खिलाना ज्यादा कारगर साबित होता है, यानी 3 से 5 मीटर की फुलर लेंथ पर, वहीं भारत में 4 से 6 मीटर की लेंथ ही सटीक मानी जाती है.
श्रीलंका में स्पिनर्स को कैसे मिलते हैं विकेट?
श्रीलंकाई पिचों पर बैक-ऑफ-ए-लेंथ गेंदें फेंकने पर बल्लेबाजों को कट या पुल शॉट खेलने का पूरा मौका मिलता है. वहीं, जब गेंद को थोड़ा आगे टप्पा खिलाया जाता है और खेल पूरा बदल जाता है. आगे की गेंद पर बल्लेबाजों को ड्राइव खेलने या आगे आकर खेलने के लिए मजबूर होना पड़ता है. जिसके चलते गेंद के टर्न या असमान उछाल के कारण अंदरूनी किनारा लगने, बोल्ड होने या LBW होने की संभावना काफी बढ़ जाती है.
भारतीय स्पिनर्स के सामने क्या है बड़ी चुनौती?
श्रीलंका में घरेलू और विदेशी स्पिनरों के प्रदर्शन का अंतर सिर्फ 3 के औसत का रहा है, यानी श्रीलंका में विदेशी गेंदबाजों के लिए भी मौके बराबर रहते हैं. लेकिन इस बार भारतीय टीम मैनजमेंट के लिए चुनौतियां थोड़ी अलग हैं. आर अश्विन जैसे अनुभवी ऑफ-स्पिनर की गैरमौजूदगी में भारतीय स्पिनर्स को नई रणनीति बनानी होगी. श्रीलंका के पिछले दौरे पर आर अश्विन टीम का हिस्सा थे. वहीं, 37 साल की उम्र में रवींद्र जडेजा अपनी गति में कितना बदलाव कर पाते हैं और क्या वह धीमी गति से गेंदबाजी को अपनाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा. इसके अलावा, मानव सुथार ने अब तक सिर्फ एक टेस्ट खेला है और कुलदीप यादव की प्लेइंग-11 में मौजूदगी परिस्थितियों पर निर्भर करेगी.
