गुंडा एक्ट उत्पीड़न का हथियार नहीं, यूपी पुलिस को फटकार… गोंडा के जाहिद अली पर इलाहाबाद होई कोर्ट ने कार्रवाई की रद्द

उत्तर प्रदेश में UP Control of Goondas Act, 1970 के इस्तेमाल को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन के रवैये पर बेहद कड़ी टिप्पणी की है. जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने गोंडा निवासी जाहिद अली के खिलाफ Goondas Act के तहत की गई कार्रवाई को रद्द करते हुए कहा कि इस तरह के शक्तिशाली कानून का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को परेशान करने या उत्पीड़न के हथियार के तौर पर नहीं किया जा सकता. हाई कोर्ट ने कहा कि उसके सामने लगातार ऐसे मामले आ रहे हैं, जिनसे ये प्रतीत होता है कि राज्य सरकार Goondas Act को उत्पीड़न के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के अपने रवैये पर कायम है.
जाहिद को 6 महीने के लिए गोंडा से किया गया था बाहर
गोंडा जिला प्रशासन ने 11 मई 2026 को जाहिद अली के खिलाफ Goondas Act के तहत कार्रवाई की थी. उन्हें गुंडा घोषित करते हुए 6 महीने के लिए गोंडा जिले से बाहर रहने का आदेश दिया गया था.
प्रशासन ने कार्रवाई के लिए मुख्य रूप से तीन आधारों का सहारा लिया था
- वर्ष 2010 का आपराधिक मुकदमा
- वर्ष 2020 का आपराधिक मुकदमा
- पुलिस की बीट सूचना रिपोर्ट
2010 के केस में 2017 में ही हो चुके थे बरी
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने सबसे महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि जाहिद अली के खिलाफ जिस 2010 के मुकदमे को कार्रवाई का आधार बनाया गया था, उसमें वह 2017 में ही बरी हो चुके थे. कोर्ट ने पाया कि इसके बावजूद पुलिस रिपोर्ट में पुराने मुकदमे को इस तरह प्रस्तुत किया गया, जिससे जाहिद की स्थिति को लेकर गलत तस्वीर सामने आती थी. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मुकदमे में उसकी संलिप्तता को उसके बरी हो जाने के बाद उसे गुंडा घोषित करने के लिए आधार नहीं बनाया जा सकता.
कोर्ट ने कहा कि सिर्फ एक लंबित मुकदमा आदतन अपराधी होने का सबूत नहीं है. हाई कोर्ट ने साल 2020 के मुकदमे को भी Goondas Act लगाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना. कोर्ट ने कहा कि सिर्फ किसी व्यक्ति के खिलाफ एक मुकदमा लंबित होना यह साबित नहीं करता कि वो आदतन अपराधी है.
इसके अलावा 2020 के मुकदमे और 2026 में Goondas Act के तहत कार्रवाई के बीच करीब 6 साल का अंतर था. कोर्ट ने कहा कि इतने लंबे अंतराल के बाद कार्रवाई करने के लिए आवश्यक reasonable nexus यानी उचित संबंध दिखाई नहीं देता.
बीट रिपोर्ट पर भी कोर्ट ने उठाए सवाल
पुलिस ने एक बीट सूचना रिपोर्ट को भी जाहिद के खिलाफ कार्रवाई का आधार बनाया था. लेकिन कोर्ट ने पाया कि उस सूचना के आधार पर कोई आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं हुआ था. साथ ही, जाहिद को उस आरोप पर अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर भी नहीं दिया गया.
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर दिए बिना ऐसी पुलिस रिपोर्ट को उसके खिलाफ Goondas Act की कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता. ये प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांत के विपरीत है.
पुलिस की रिपोर्ट पर कोर्ट की गंभीर टिप्पणी
कोर्ट ने पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए. हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस को ये पता होना चाहिए था कि जाहिद अली वर्ष 2010 के मामले में 2017 में ही बरी हो चुके हैं. इसके बावजूद उस मामले को पुलिस रिपोर्ट में शामिल किया गया.
Goondas Act बहुत शक्तिशाली कानून, सावधानी से हो इस्तेमाल
हाईकोर्ट ने कहा कि Goondas Act एक बहुत शक्तिशाली कानून है. इसका इस्तेमाल सामान्य आपराधिक मामलों में या किसी व्यक्ति को परेशान करने के लिए नहीं किया जा सकता. ऐसे कानून का इस्तेमाल बहुत सावधानी और सीमित परिस्थितियों में किया जाना चाहिए, खासकर तब जब संबंधित व्यक्ति की गतिविधियों से वास्तव में सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) को खतरा हो.
हाईकोर्ट ने पूरी कार्रवाई की रद्द
मामले में हाईकोर्ट ने जाहिद अली को राहत देते हुए उन्हें गुंडा घोषित करने का आदेश रद्द कर दिया. गोंडा जिले से 6 महीने के externment का आदेश रद्द कर दिया. कमिश्नर द्वारा उनकी अपील खारिज करने का आदेश भी रद्द कर दिया. इस तरह जाहिद अली के खिलाफ Goondas Act के तहत की गई पूरी कार्रवाई हाईकोर्ट ने खत्म कर दी.
