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Lakshmi Narayan Rajyog: लक्ष्मी नारायण राजयोग क्या है? जानें कैसे दिलाता है धन, वैभव और मान-सम्मान!

Lakshmi Narayan Rajyog: लक्ष्मी नारायण राजयोग क्या है? जानें कैसे दिलाता है धन, वैभव और मान-सम्मान!

Lakshmi Narayan Rajyog ke labh: ज्योतिष में कई ऐसे शुभ योग बताए गए हैं जो व्यक्ति के जीवन में सफलता, सुख और समृद्धि लाने वाले माने जाते हैं. इन्हीं में से एक बेहद प्रभावशाली और शुभ योग है लक्ष्मी नारायण राजयोग. यह योग धन, वैभव, प्रतिष्ठा और जीवन में उन्नति का प्रतीक माना जाता है. जब किसी व्यक्ति की कुंडली में यह योग बनता है तो उसे करियर, व्यापार और सामाजिक जीवन में विशेष सफलता मिलने की संभावना बढ़ जाती है. आइए जानते हैं कि लक्ष्मी नारायण राजयोग क्या होता है, यह कैसे बनता है और इसके क्या लाभ होते हैं.

कैसे बनता है लक्ष्मी नारायण राजयोग?

वैदिक ज्योतिष के अनुसार, यह योग दो प्रमुख ग्रहों बुध और शुक्र की युति से बनता है.

  • बुध: बुद्धि, तर्क, वाणी और व्यापार के कारक माने जाते हैं.
  • शुक्र: धन, ऐश्वर्य, विलासिता, सौंदर्य और सुख-सुविधाओं के स्वामी हैं.

जब किसी जातक की कुंडली के किसी एक ही भाव में बुध और शुक्र एक साथ विराजमान होते हैं, तो ‘लक्ष्मी नारायण योग’ का निर्माण होता है. ज्योतिष में बुध को ‘नारायण’ और शुक्र को ‘लक्ष्मी’ का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इनकी युति को बेहद कल्याणकारी माना गया है.

लक्ष्मी नारायण राजयोग के लाभ

अपार धन-संपत्ति: शुक्र की कृपा से जातक को भौतिक सुख-सुविधाएं मिलती हैं, वहीं बुध की चतुराई उस धन को बढ़ाने और निवेश करने में मदद करती है. इससे व्यक्ति की आर्थिक स्थिति बेहद मजबूत हो जाती है.

मान-सम्मान और प्रतिष्ठा: यह योग व्यक्ति को समाज में एक खास पहचान दिलाता है. ऐसे लोग अपनी वाणी और व्यक्तित्व से दूसरों को प्रभावित करने में सफल रहते हैं.

करियर और व्यापार में उन्नति: जो लोग व्यापार से जुड़े हैं, उनके लिए यह योग वरदान की तरह है. बुध व्यापारिक बुद्धि देता है, जिससे कठिन फैसले लेना आसान हो जाता है और मुनाफे के नए रास्ते खुलते हैं.

लक्जरी लाइफस्टाइल: इस योग के प्रभाव से व्यक्ति को आलीशान मकान, वाहन और हर तरह के सुख साधन प्राप्त होते हैं.

कला और रचनात्मकता: चूंकि शुक्र कला का कारक है, इसलिए इस योग वाले व्यक्ति गायन, अभिनय, लेखन या किसी भी रचनात्मक क्षेत्र में नाम कमाते हैं.

किन भावों में यह योग होता है सबसे शक्तिशाली?

यूं तो बुध-शुक्र की युति शुभ है, लेकिन अगर यह कुंडली के प्रथम चतुर्थ, सप्तम या दशम भाव (केंद्र स्थान) या फिर पांचवें और नौवें भाव (त्रिकोण स्थान) में बने, तो इसके परिणाम कई गुना बढ़ जाते हैं.

क्या आपकी कुंडली में भी है यह योग?

अगर आपकी कुंडली में यह योग है लेकिन आपको इसके पूरा फल नहीं मिल रहे, तो इसका कारण ग्रहों का कमजोर होना या उन पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो सकती है. ऐसे में शुक्र और बुध के बीज मंत्रों का जाप करना फायदेमंद होता है.

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिष शास्त्र की जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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