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रांची का VIP सरकारी स्कूल! 2 बच्चों को पढ़ाने के लिए 2 टीचर, हर दिन पकता है मिड-डे मील, आखिर क्यों छात्र यहां नहीं लेते एडमिशन?

रांची का VIP सरकारी स्कूल! 2 बच्चों को पढ़ाने के लिए 2 टीचर, हर दिन पकता है मिड-डे मील, आखिर क्यों छात्र यहां नहीं लेते एडमिशन?

Ajab Gajab News: झारखंड की राजधानी रांची के थड़पखना में स्थित एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय इन दिनों पूरे राज्य में चर्चा का विषय बना हुआ है. राजकीयकृत प्राथमिक विद्यालय हिंदी (थड़पखना) अपनी एक अजीबोगरीब स्थिति को लेकर सुर्खियों में है. चौकिए मत, लेकिन यह बिल्कुल हकीकत है कि इस पूरे स्कूल में केवल 2 बच्चे ही शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं. सबसे दिलचस्प बात यह है कि इन दो बच्चों को पढ़ाने और संभालने के लिए स्कूल में बाकायदा 2 सरकारी शिक्षक नियमित रूप से कार्यरत हैं. इसके बावजूद स्कूल का पूरा सिस्टम (हाजिरी से लेकर रसोइया तक) हर दिन पूरी मुस्तैदी से काम कर रहा है.

इस प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने वाले दो नन्हे छात्र प्रीति कुमारी और अर्जुन कुमार हैं. प्रीति कुमारी इस विद्यालय में कक्षा 4 (फोर) की पढ़ाई कर रही है. अर्जुन कुमार कक्षा 1 (वन) में नामांकित है और अपनी शुरुआती शिक्षा ले रहा है. पूरे स्कूल में सिर्फ यही दो बच्चे हैं जो हर दिन स्कूल आते हैं. इन दोनों बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए दो शिक्षक रोजाना समय पर स्कूल पहुंचते हैं और बकायदा क्लास लेते हैं.

नियमित हाजिरी और दोनों बच्चों के लिए पक रहा ‘मिड-डे मील’

भले ही स्कूल में बच्चों की संख्या न के बराबर हो, लेकिन सरकारी नियमों और योजनाओं का पालन यहां शत-प्रतिशत हो रहा है. स्कूल के रजिस्टर में प्रतिदिन दोनों बच्चों की उपस्थिति दर्ज की जाती है. शिक्षकों की हाजिरी भी नियमित रूप से लगती है. सरकार की मिड-डे मील योजना के तहत इन दोनों बच्चों के लिए प्रतिदिन स्कूल में ताजा और पौष्टिक भोजन पकाया जाता है. यानी दो बच्चों के लिए रसोइया भी अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभा रहा है.

शिक्षकों ने साधी चुप्पी, व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल?

जब मीडिया और स्थानीय लोगों ने विद्यालय में मात्र दो बच्चों के होने को लेकर वहां मौजूद दोनों शिक्षकों से सवाल पूछे, तो उन्होंने कुछ भी बोलने से साफ इनकार कर दिया और चुप्पी साध ली. यह स्थिति राज्य की शिक्षा व्यवस्था और भारी-भरकम बजट पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ी करती है. एक तरफ राज्य सरकार बच्चों को निजी स्कूलों की तर्ज पर आधुनिक सुविधाएं देने, बेहतर शिक्षा और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के लिए अपने बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा पानी की तरह बहा रही है. ऐसे में राजधानी के ही एक स्कूल से बच्चों और अभिभावकों का पूरी तरह मुंह मोड़ लेना चिंताजनक है.

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पड़ताल में सामने आई असली वजह: क्यों खाली हुआ स्कूल?

जब इस बात की गहराई से पड़ताल की गई कि आखिर इस स्कूल में बच्चे क्यों नहीं आ रहे हैं, तो कुछ जमीनी हकीकत और स्थानीय कारण सामने आए. यह एक प्राथमिक विद्यालय है, जहां केवल पांचवीं कक्षा तक ही पढ़ाई की सुविधा उपलब्ध है. थड़पखना और उसके आसपास के क्षेत्र में कई अन्य सरकारी और निजी (प्राइवेट) स्कूल मौजूद हैं. इन पड़ोसी स्कूलों में 10वीं से लेकर प्लस टू (+2/बारहवीं) तक की पढ़ाई की निरंतर व्यवस्था है.

स्थानीय अभिभावकों का मानना है कि बार-बार स्कूल बदलने के झंझट से बचने के लिए बच्चों का दाखिला सीधे उन स्कूलों में कराना बेहतर है जहां आगे की पढ़ाई भी हो सके. यही कारण है कि स्थानीय लोगों ने इस प्राथमिक विद्यालय के बजाय अन्य बड़े स्कूलों को विकल्प के रूप में चुना, जिससे यह स्कूल लगभग खाली हो गया.

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