सादगी और विनम्रता का बेजोड़ संगम थे सपा विधायक आलम बदी, दरवाजे से नहीं लौटता था कोई खाली

समाजवादी पार्टी के विधायक आलमबदी आज़मी के जाने से पूरे आज़मगढ़ में शोक व्याप्त हो गया है. कम ही जन प्रतिनिधि ऐसे होते हैं, जिनकी मृत्यु से हर समुदाय को दुख हो और लोग राजनीतिक विचारधारा से हट कर शोक व्यक्त कर रहे हों. आलमबदी आज़मी ऐसे ही विधायक थे. आज़मगढ़ की निज़ामाबाद सीट से वे पहले 1996 और 2002 में जीते. फिर 2007 में उन्हें बसपा प्रत्याशी से उन्हें हारना पड़ा. परंतु यह उनकी सादगी और लोकप्रियता थी कि 2012, 2017 और 2022 में वे लगातार विधायक चुने जाते रहे. कुछ दिनों की अस्वस्थता के चलते लखनऊ में उनका इलाज चला. इसके बाद उन्हें घर भेज दिया गया. बुधवार की रात उनका निधन हो गया. 92 वर्ष के आलमबदी आज़मी ज़िले के बहुत ही लोकप्रिय विधायक थे. आलमबदी आज़मी उन नेताओं में से थे, जो जीवन भर डेड ऑनेस्ट बने रहे. कभी भी शासन से उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं मांगा.
सादगी और विनम्रता का बेजोड़ संगम
उनकी विनम्रता के किस्से सुनाते हुए मनीष तिवारी ने बताया, मुझे आज भी एक बरसाती दिन हूबहू याद है. वो तमतमाए हुए सीधे सीएमओ के चैंबर में दाखिल हुए इत्तेफ़ाक़ से मैं भी वहीं बैठा था और बारिश मूसलाधार बरस रही थी. विधायक जी के आवाज़ में वही पुराना तेवर था, डॉक्टर साहब! मैंने फलां जगह एंबुलेंस भेजने को कहा था. आधा घंटा होने को आया, अभी तक एंबुलेंस नहीं पहुंची. आखिर हो क्या रहा है?” कमरे का माहौल एकदम सन्नाटे में बदल गया. संयोग से मैं उसी समय कार्यालय पहुंचते हुए रास्ते में वही एंबुलेंस उस दिशा में जाते देख चुका था. मैंने हिम्मत करके धीरे से कहा, सर… संभवतः एंबुलेंस वहां पहुंच गई होगी.
बस इतना कहना था कि उनकी त्योरियां और चढ़ गईं. शायद उन्हें लगा कि मैं बात को हल्का कर रहा हूं. उन्होंने उसी समय फोन मिलाया, मेरी बात की तस्दीक़ करनी चाही. उधर से जवाब आया, साहब, एंबुलेंस पहुंच चुकी है. एक पल में उनका चेहरा बदल गया. जिस आदमी का गुस्सा अभी कमरे की दीवारों से टकरा रहा था, उसी आदमी ने बिना एक क्षण गंवाए दोनों हाथ जोड़ दिए और कहा- डॉक्टर साहब! मुझसे गलती हो गई. माफ़ कर दीजिए. उस दिन हम सब लोग जो चैंबर में बैठे थे उनके इस तरह हाथ जोड़ कर मुआफ़ी मांगने से खुद ही शर्मिंदा हो गये थे. क्योंकि हम एक विधायक को नहीं, एक बड़े इंसान को देख रहे थे.
हर एक के लिए दरवाज़े खुले
मनीष जी बताते हैं, सत्ता उस समय उनके अपने दल की थी. उनका कद इतना बड़ा था कि लोग सामने बोलने से पहले दस बार सोचते थे. लेकिन गलती अपनी निकली तो न अहंकार बचा, न पद का गुरूर. क्षमा मांगने में उन्हें एक पल की भी देर नहीं लगी. आज राजनीति में ऐसे दृश्य दुर्लभ हैं. उनकी राजनीति में दिखावा नहीं था. सड़क बनती थी तो खुद देखने निकल पड़ते थे. ठेकेदार उनके क्षेत्र में काम करने से पहले सौ बार सोचता था, क्योंकि वहां कमीशन नहीं, काम की गुणवत्ता देखी जाती थी. गलत काम पर डांट पड़ती थी, और कभी-कभी उनके वही मशहूर अल्फ़ाज़ भी सुनने पड़ते थे- बेईमान धूर्त! चोट्टा कहीं का” उनके दरवाजे से कोई खाली नहीं लौटता था. लेकिन अगर पैरवी गलत होती, तो वही दरवाजा सबसे पहले बंद हो जाता था बल्कि बंद ही नहीं होता था जो काम होना होता उस पर भी ग्रहण लग जाता था.
बुध की रात आज़मगढ़ को दुखी कर गई
बुधवार की रात आज़मगढ़ के निवासियों को भारी आघात दे गई. आलमबदी आज़मी का निधन का समाचार सब लोग दुखी हो गए. शहर में कुर्मी टोला स्थित उनके आवास पर विधायक जी का निधन हुआ. उनका जन्म 16 मार्च 1936 को ग्राम बिन्दवल तहसील सगड़ी में हुआ इनके पिता का नाम बदीउज्जमा था जो मियां साहब जॉर्ज इस्लामिया इंटर कॉलेज गोरखपुर में बतौर शिक्षक तैनात थे. आलमबदी आजमी ने 1956 में इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल इंजीनियरिंग में टेक्निकल इंस्टिट्यूट गोरखपुर से डिप्लोमा किया. उन्होंने अपनी 12वीं की शिक्षा इस्लामिया कॉलेज गोरखपुर से 1953 में पूरी की थी. आलमबदी आज़मी के 6 पुत्र शहजाद आलम, शादाब आलम, सिराज आलम, इंतिजाब आलम, दानिश आलम और मुस्तफा आलम हैं. इनकी एक पुत्री नौशीन आलम थी जिनका 1993 देहांत में हो गया.
मुलायम सिंह यादव ने मंच दिया
आज़मगढ़ में समाजवादी पार्टी के नेता राजेश गिरी ने बताया कि आलमबदी आज़मी साहब उन लोगों में से थे जिन्हें नेताजी (दिवंगत मुलायम सिंह यादव) पकड़ कर अपने साथ लाए. 1992 में सपा में आने के पूर्व आलमबदी आज़मी मुस्लिम लीग की राजनीति में थे. उनकी लोकप्रियता और ईमानदारी के किस्से तब भी आम थे. परंतु वे जन प्रतिनिधि नहीं बन सकते थे. इसलिए नेता जी उन्हें सपा में लाए और उन्हें 1996 में विधायक का चुनाव जितवाया. यूं निजामाबाद सीट पर मुस्लिम आबादी पर्याप्त है लेकिन कोई भी नेता अकेले अपने समुदाय के बूते नहीं जीत सकता. मुलायम सिंह यादव ने उन्हें व्यापक फलक वाला मंच दिया. सपा को हिंदू और मुस्लिम सभी वोट करते थे. इसका फ़ायदा आलमबदी आज़मी साहब को मिला और वे विधायक बने. इसके बाद उन्होंने अपनी ईमानदारी और सादगी से सफलता की सीढ़ियां चढ़ीं.
मौलाना शिबली के गांव में पैदा हुए थे आलमबदी आज़मी
राजेश गिरी ने बताया कि मौलाना शिबली के गांव बिंदवल में पैदा हुए आलमबदी आज़मी पढ़ाई में तेज थे. मौलाना शिबली के चलते आज़मगढ़ के मुसलमानों में उच्च शिक्षा लेने की होड़ थी. इसलिए आलमबदी आज़मी ने भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. किंतु सामाजिक कार्यों का जज्बा उनमें इतना अधिक था कि जरा भी कहीं कोई लालफीताशाही दिखी तो वे विरोध करने लगते थे. आजन्म उनके अंदर यह सक्रियता रही. उन्होंने कोई धन नहीं अर्जित किया. सदैव सबके काम किये, चाहे हिंदू हो या मुसलमान. इसीलिए उनकी लोकप्रियता सब में थी. सादगी इतनी कि मुड़ा-तुड़ा कुर्ता-पायजामा धारी यह विधायक हर पुकार पर हाज़िर था. कभी अपनी बुलेरो पर सवार हो कर आता तो कभी पैदल या साइकिल पर. आज के समय जब हर विधायक अपने साथ पुलिस की फ़ौज-फाटा रखता है तब आलमबदी आज़मी बिना किसी सुरक्षा के रहते.
हन्नान मोल्लाह की कड़ी के आख़िरी जन नेता
वे कहते थे, उनकी जनता ही उनकी सुरक्षा है. हर विधायक को एक गनर अनिवार्य तौर पर मिलता है, उसे भी वे अक्सर छुट्टी दे देते. कहते, घर जाओ, आराम करो. उनकी सादगी और ईमानदारी की तुलना हावड़ा के समीप उलबेड़िया से सीपीएम के सांसद रहे हन्नान मोल्लाह से की जा सकती है. जिन्होंने कभी सुरक्षा नहीं ली और सदैव बिना स्त्री किया हुआ कुर्त्ता-पायजामा व चप्पल पहनते और हर एक के काम में उपस्थित थे. हन्नान मोल्लाह उन सांसदों में से थे जो हर बार इस प्रस्ताव का विरोध करते कि सांसदों का वेतन-भत्ता बढ़ाया जाए. वे तो जन प्रतिनिधियों की पेंशन के भी ख़िलाफ़ थे. ऐसे लोकप्रिय और सदैव जनता के हित के लिए प्रतिबद्ध जन प्रतिनिधि अब समाप्त होते जा रहे हैं. ऐसे ही लोगों की कड़ी में थे आलमबदी आज़मी साहब. उनकी स्मृतियों को नमन!