Asha & lata: दिल चीज़ क्या है… उमराव जान के गानों ने जब आशा भोसले को पाकीजा की लता मंगेशकर-सी ऊंचाई पर पहुंचा दिया

सत्तर का दशक बीत रहा था. आशा भोसले एक उभरती गायिका के तौर पर अपनी पहचान बना चुकी थीं. लता मंगेशकर बेशक शीर्ष पर थीं लेकिन आशा अपनी आवाज़ की खनक से संगीतकारों के लिए एक नया विकल्प बन चुकी थीं. वो बैजयंती माला, मीना कुमारी, शशिकला जैसी अभिनेत्रियों को आवाज़ दे चुकी थीं लेकिन इसके बावजूद तब उन्हें हेलन की आवाज़ कहा जाता था. बी या सी ग्रेड का ठप्पा छूट नहीं पा रहा था. आइटम सांग पेश करने वाली एक्ट्रेस की आवाज कही जाती थी. कहने का आशय यह कि तब लता की तरह गायन में प्रतिष्ठा नहीं मिली थी. इसके लिए उन्हें लंबा संघर्ष करना पड़ा. लता मंगेशकर के बराबर कद बनाने में कई साल लगे और उनकी यह मुराद अस्सी के दशक में जाकर पूरी हो सकी, जब मुजफ्फर अली और रेखा की क्लासिक पेशकश उमराव जान रिलीज हुई. मीना कुमारी की पाकीजा से इसकी तुलना कई स्तरों पर की गई.
आशा भोसले ने उस दौर में हेलन के लिए कई गाने गाए थे. स्वाभाविक था कि उन्हें तब हेलन की आवाज कहा गया. मसलन 1978 की अमिताभ बच्चन वाली डॉन का गाना ये मेरा दिल प्यार का दीवाना… या फिर उससे पहले 1971 की जितेंद्र की कारवा में पिया तू अब तो आजा… या फिर 1973 की संजीव कुमार की अनामिका में आज की रात कोई आने को है… ने तब धूम मचाने में जरा भी कसर नहीं छोड़ी. आशा भोसले ने इन गानों की वजह से एक अलग श्रोता वर्ग तैयार किया. ऐसा श्रोता, जो लता मंगेशकर के गानों को बड़े चाव से सुनता तो था लेकिन जिस कशिश को पाने की ख्वाहिश थी, वह आशा की आवाज़ सुनने के बाद पूरी होती थी.
80 के दशक के गायन में कशिश की मांग बढ़ी
दरअसल लता के सुर में उच्च कोटि की क्लासिकी थी. उस दायरे को मेंटेन रखते हुए उन्होंने प्रसिद्धि का शिखर हासिल किया. क्योंकि क्सालिकी का अपना मिजाज होता है. टाइमिंग और मूड के हिसाब से क्लासिकी के आनंद को हम महसूस कर पाते हैं. लेकिन जो ट्रेडिशनल नहीं है, उसके लिए कोई टाइमिंग और मूड की दरकार नहीं होती. सत्तर और अस्सी के दशक के बाद जिस तरह से सोसायटी में लोगों की लाइफस्टाइल बदली, शहरीकरण में तेजी आई वहां वेस्टर्न की गुंजाइश धीरे-धीरे बढ़ने लगी.
यही वो दौर था जब आशा भोसले का सुर क्लासिकी के घेरे को तोड़कर अपने लिए एक नया मुकाम बनाने के लिए बेताब था. इसे मो. रफी साहब और किशोर कुमार की गायन शैली में अंतर के जरिए भी समझा जा सकता था. मो. रफी चाहे कितने भी मस्ती भरे गाने गाते, क्लासिकी उनसे छूटती नहीं लेकिन किशोर कुमार ने परंपरा तोड़कर अपनी-सी एक नई क्लासिकी इजाद कर दी. आशा भोसले ने भी किशोर कुमार की तरह परंपरा के कई बंधन तोड़े.
हालांकि आशा भोसले को अब भी बी श्रेणी की गायिका ही माना जाता था. उन्हें ए श्रेणी की गायिका का दर्जा तब मिला जब उन्होंने उमराव जान के गाने गाए. शहरयार के लिखे गाने और खय्याम के संगीत ने इस फिल्म के जरिए आशा भोसले को वही प्रतिष्ठा दिलाई जो कमाल अमरोही और मीना कुमारी की क्लासिक मूवी पाकीजा में गाने के बाद लता मंगेशकर को मिल चुकी थी.

इन्हीं लोगों ने…Vs इन आंखों की मस्ती के…
दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए… ये क्या जगह है दोस्तो… इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं… जैसे उमराव जान के गानों ने पाकीजा के इन्हीं लोगों ने ले ली लीन्हा दुपट्टा मेरा…चलते-चलते मुझे कोई मिल गया था… मौसम है आशिकाना… या ठारे रहियो ओ बांके यार रे… की याद दिला दी. सिने गीत संगीत के शौकीन पाकीजा को भूले नहीं बल्कि उनके लिए उस दस्तावेज में एक चैप्टर और जुड़ गया, जिसका नाम उमराव जान था. इसी के साथ लता के समक्ष आशा की शख्सियत भी खड़ी हो हुई.
मुजफ्फर अली ने उमराव जान यह सोच कर भले ही न बनाई हो कि उन्हें कोई पाकीजा को टक्कर देनी थी या उसके बरअक्स अपनी भी कोई मूवी बनानी है लेकिन जैसे ही यह फिल्म आई, समीक्षकों ने इन दोनों फिल्मों की तुलना करनी शुरू कर दी. इसे पहली नजर में तो पाकीजा से प्रेरित भी करार दिया गया. लेकिन जैसे जैसे गहन विश्लेषण का दौर चला, दोनों के अंतर की बारीकियां सामने आती गईं. दरअसल दोनों फिल्मों का विषय वस्तु ही नहीं बल्कि परिवेश भी समान था. मुस्लिम संस्कृति पाकीजा में थी तो उमराव जान में भी. दोनों ही कहानी में कोठे पर तवायफ की जिंदगी की दुश्वारियों को दर्शाया गया था. क्या तवायफ आम औरत की तरह जिंदगी जी सकती है-फिल्म में यह सवाल गुंथा था तो यह भी दर्शाया गया था कि अगर तवायफ सोसायटी का हिस्सा होना चाहे तो उसे किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.
पाकीजा के डायरेक्टर थे-कमाल अमरोही तो उमराव जान के डायरेक्टर हैं- मुजफ्फर अली. दोनों दिग्गज फिल्ममेकर. दोनों ही मुंबइया फिल्मी ढांचे से अलग हटकर काम करने वाले माने गए. सिनेमा के पर्दे पर जुनून पैदा करने का माद्दा रखने वाले, फिल्मों में समाज को संवेदनशील बनाने की पहल करने वाले. इतना ही नहीं, जिस तरह पाकीजा में मीना कुमारी की अदाकारी की अपनी ख्याति है उसी तरह उमराव जान में रेखा की अदायगी भी कालजयी दर्ज हो चुकी है.
पाकीजा की लता और उमराव जान की आशा
अब इसी के बरअक्स एक और समानता या तुलना लाजिमी है- लता मंगेशकर और आशा भोसले की. पाकीजा के गाने लता मंगेशकर की आवाज़ से अमर है तो उमराव जान के गाने आशा भोसले की गायकी की बदौलत आज भी लोकप्रिय हैं. पाकीजा कई सालों से बन रही थी और वह 1971 में रिलीज हुई, उसी तरह उमराव जान भी लंबे समय तक बनती रही और पाकीजा के दस साल बाद 1981 में पर्दे पर आई. 71 के आस-पास जो आशा भोसले डांसर-एक्ट्रेस हेलन की आवाज़ कही जाती थी, 81 तक आते-आते रेखा जैसी अभिनेत्रियों की आवाज़ बन गई. इसी के साथ आशा ने लता की बनाई लकीर को भी छू लिया और लता के पोजीशन की हकदार बन गईं. सभी उम्र के श्रोताओं ने आशा को लता की तरह ही स्वीकार कर लिया.
इसे संयोग ही कहेंगे कि पाकीजा को जो पुरस्कार नहीं मिल सका, उसे उमराव जान को नसीब हुआ. रेखा सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीतीं तो आशा भोंसले को सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला. इसी तरह से संगीतकार खय्याम को भी सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला. उमराव जान की धूम फिल्मफेयर पुरस्कार में भी देखी गई. एक बार फिर सर्वश्रेष्ठ फिल्म निर्देशक और संगीत निर्देशक का सम्मान मिला.
लता और आशा-रिकॉर्ड प्लेयर का ‘ए’ और ‘बी’ साइड
गौरतलब है कि आशा की प्रशंसा के तहत लिखी जा रही कहानियों से लता की अहमियत कभी कम नहीं होती. लता सदैव सर्वोपरि थीं और रहेंगी लेकिन उस सर्वोच्च शिखर के समानांतर एक नया शिखर बनाना भी एक बड़ी उपलब्धि कही जाएगी. लता और आशा में उतना ही अंतर है जितना कि किसी रिकॉर्ड प्लेयर के ए साइड या बी साइड में होता है. बी साइड में चाहे कितने भी अच्छे गाने हों हम पहले ए साइड सुनते के आदि होते हैं, बी साइड बाद में. लता और आशा की प्रतिभा और लोकप्रियता भी रिकॉर्ड प्लेयर का ए और बी साइड है. आज के श्रोता अपनी पसंद के हिसाब से जो चाहें तय करें, पहले ए साइड के गाने सुनें या पहले बी साइड के.
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