Janmashtami 2026: विष्णु की 16 कलाओं से युक्त हैं कृष्ण, जानें आज भी कितने प्रासंगिक

कृष्ण हमारे पौराणिक इतिहास में एक ऐसे नायक हैं, जिनकी प्रासंगिकता सदैव बनी रहेगी. उनकी जितनी जरूरत द्वापर में थी उतनी ही आज भी है. उनके जीवन की हर घटना एक नया आख्यान रचती है. उनके जन्म काल से ले कर बहेलिये द्वारा उनको तीर मारे जाने तक. उनका जन्म एक घटना थी और मृत्यु भी. उनकी बाल लीलाएं, कौशोर्य का प्रेम, ग्रामीणों की अति वृष्टि से रक्षा, नाग के फन पर चढ़ कर नृत्य करना और महाभारत में पांडवों की रक्षा, उनकी कूटनीति, उनका गीत ज्ञान आदि ऐसी घटनाएं हैं, जो यह स्वीकार नहीं करवा पातीं कि क्या कृष्ण कोई एक व्यक्ति थे या तमाम व्यक्तित्त्वों को एक रूप दिया गया है. यही कृष्ण के रूप में विख्यात हैं. इसीलिए कृष्ण को पुराणों में विष्णु की सोलह कलाओं से युक्त अवतार माना गया है. कृष्ण कहीं भी संकुचित या दक़ियानूस नहीं लगते. बल्कि वे अपने आप में संपूर्ण महा-मानव प्रतीत होते हैं.
जेल में जन्म
कृष्ण के पूरे जीवन वृत्त को समझे बिना कृष्ण को पूरी तौर पर नहीं जाना जा सकता. कृष्ण उस दौर में पैदा हुए जब भारत में चक्रवर्ती सम्राट बनने की होड़ मची थी. जरासंध जैसे राजा हर छोटे-बड़े सामंत को अपने अधीन करने को उतावले थे. जिस किसी राजा ने उसकी अधीनता नहीं स्वीकार की, उसे बंदी बना लिया. दूसरी तरफ़ उसी का दामाद कंस इतिहास में अजर अमर होना चाहता था. पर जब उसे पूर्वाभास हुआ कि उसकी बहन और बहनोई का बेटा उसका काल बनेगा तो उसने अपनी बहन देवकी और बहनोई वसुदेव को ही क़ैद कर लिया. उसने तय किया था कि वह वसुदेव-देवकी की हर संतान को मार देगा फिर भला कैसे उसका वध होगा. किंतु फिर इनका आठवां पुत्र कृष्ण पैदा हुआ. पहरेद्वारों को सोता पा कर वसुदेव इस नवजात पुत्र को लेकर यमुना पार गोकुल पहुँचे और अपने मित्र नंद के यहां छोड़ आए. वहीं कृष्ण का लालन-पालन हुआ.
कृष्ण की चौकन्नी नज़र और दूर दृष्टि
कोई भी बच्चा जब हर समय शत्रुओं की नज़र में रहे तो वह अतिरिक्त चौकस हो जाता है. इन हालात ने कृष्ण को नई दृष्टि दी. शत्रु-मित्र और सहायक सबको पहचानने की. उन्होंने किसी राज्य का सहारा नहीं लिया बल्कि अपने चहेते लोगों की एक फ़ौज बनाई, जो युद्ध नहीं करती थी लेकिन कृष्ण की सुरक्षा के लिए हर वक़्त चौकन्नी रहती. क्योंकि कृष्ण ने उनके अंदर आपदाओं से जूझने और लड़ने की इच्छा-शक्ति पैदा की. कालिया नाग मंथन तथा गोवर्धन पर्वत की आश्रय के रूप में खोज करना ये सब कृष्ण की स्थापनाएं थीं. बाद में पुराण-कारों ने उन स्थापनाओं में चमत्कार भरे. कालिया मंथन के माध्यम से उन्होंने नाग जाति को मनुष्यों के क़रीब लाने की कोशिश की. तब तक नागों के राज्य बचे हुए थे. मनुष्य चूंकि नागों के शत्रु गरुड़ का मित्र था इसलिए नाग सदैव राक्षसों के करीबी रहे. लेकिन कृष्ण द्वारा कालिया नाग के मान-मर्दन से नाग मनुष्यों के मित्र बन गए.
टॉटम युग के प्रतीक
हमारे वेद-पुराण और आदिम काल के ग्रंथ चूंकि स्मृति के सहारे चलते रहे इसलिए कभी भी उनका तार्किक विश्लेषण नहीं हुआ. पुराने समय में बहुत सारी बातें प्रतीकों में कही जाती थीं, इसलिए उनके निहितार्थ समझने जरूरी थे. नाग, गरुड़, रीछ, वानर आदि टॉटम थे जो मुखौटा लगाते थे. ये एक तरह की आदिवासी परंपरा थीं. आज भी दक्षिण भारत में शास्त्रीय नृत्य मुखौटा लगा कर होते हैं. कथकली में नर्तकी और नर्तक मुखौटा लगा कर नृत्य करते हैं तो भरत नाट्यम में नर्तक विभिन्न तरह की मुद्राएं चेहरे पर बनाता है. दरअसल मनुष्य जिन प्राणियों के आसपास रहता था, उनकी जीवन शैली भी सीख लेता था. टॉटम यही शैली है. इस शैली को मानने वाली जातियाँ बहुत बाद तक रही हैं. उनको समय की मुख्यधारा में आने में कई युग बीत गए. हर टॉटम अपने स्वाभाविक शत्रु को शत्रु की नज़र से ही देखता था. जैसे नाग टॉटम के लोग गरुड़ टॉटम से शत्रुता रखते थे.
समय और काल को समझ कर विश्लेषण हो
ऐसा कोई भारत में ही नहीं था बल्कि ग्रीक और रोमन पुराणों में भी नाग कन्या और मत्स्य कन्याओं का उल्लेख मिलता है. लेकिन उस समय के ऐसी धारणाओं के आधार पर प्राचीन सभ्यताओं का मज़ाक उड़ाना अपने को हल्का साबित करना है. चीन में कई तरह की ऐसी कलाएँ आज भी हैं, जब कोई भिक्षु नदी की जल धारा को बिना पानी में भीगे पार कर लेता है. यह मार्शल आर्ट है. चीन, जापान और कोरिया में चिकित्सा की एक्यूप्रेशर पद्धति आज भी मान्य है. जबकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान उसे ख़ारिज करता है. इसलिए स्वाभाविक न दिखने वाली बातों को चमत्कारिक या कल्पना बताना भी एक तरह की जड़ता है. कृष्ण के चरित्र में कई ऐसी बातें मिलती हैं जो अलौकिक प्रतीत होती हैं. परंतु उन विचित्रताओं को समझने की कोशिश कभी नहीं की गई. कृष्ण अपने आप में चमत्कार हैं, विराट है. उनका स्वरूप समझने के लिए कृष्णमय होना होगा.
गोवर्धन पर्वत से रक्षा और शाकाहार
अति वृष्टि के समय ऊंचाई पर बसाना सदैव लाभ-दायक होता है. कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत की शरण ले कर यही शिक्षा दी. वर्षा कितनी भी हो लेकिन ऊंचाई पर जो बसा है, वह सुरक्षित रहेगा. गाय आदि पशुओं की रक्षा, उनके चरने के लिए चारागाह सुरक्षित रखना, यह मनुष्य की जिम्मेदारी है. क्योंकि जीव-जंतुओं में वही श्रेष्ठ है. मांसाहार की बजाय शाकाहार पर जोर हमारे पुराणों में सबसे पहले कृष्ण ने दिया. इसकी वज़ह यह भी है कि तब तक कृषि उन्नत होने लगी थी. कृष्ण के बड़े भाई बलभद्र या बलदाऊ सदैव हल को धारण करते हैं, यह कृषि का ही प्रतीक हैं. यूं भी कृष्ण शब्द कृष धातु से बना है. इसका अर्थ खेत जोतने वाला भी होता है. इस तरह कृष्ण का कृषि से सीधा संबंध है. कृष्ण गृहस्थों के आराध्य हैं, जिनका सामाजिक आधार कृषि कर्म है. कृष्ण गृहस्थों के देवता हैं और वैष्णव साधुओं के.
गीता के कृष्ण
कृष्ण का सबसे महत्त्वपूर्ण और विवादास्पद रोल है अर्जुन को गीता का उपदेश देने का. महत्त्वपूर्ण इसलिए क्योंकि गीता जैसा गूढ़ ज्ञान से भरा ग्रंथ हिंदू धर्म में और कोई नहीं. तथा विवादास्पद इसलिए कि यह एक ऐसा ग्रंथ जिसमें स्वयं भगवान भक्त को अहिंसा, दया, करुणा से अलग कर रहे हैं. एक तरह से ब्राह्मण टीकाकारों के अनुसार कृष्ण अर्जुन को कायरता से दूर रहने का उपदेश देते हैं. वे अर्जुन को बताते हैं कि शरीर तो नश्वर है अजर और अमर सिर्फ़ आत्मा है. इसलिए युद्ध में हिंसा अनिवार्य है. मरे तो स्वर्ग और जिये तो पृथ्वी पर चतुर्दिक राज करने का अवसर. डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने गीता के बाबत लिखा है कि गीता के माध्यम से कृष्ण उस समय अर्जुन पर पड़े अहिंसा की चेतना पर ब्राह्मणी कुठार चला रहे हैं. उनके अनुसार महाभारत कई कालखण्डों में लिखी गई. गीता लिखे जाने तक भारतीय समाज में बौद्ध और जैन मत की अहिंसा घर चुकी थी.
डॉ. अम्बेडकर की दृष्टि में कृष्ण
डॉ. अम्बेडकर लिखते हैं कि ब्राह्मण अहिंसा के फैलाव से दुखी थे. उन्होंने अपनी पुस्तक Revolution and Counter revolution in Ancient India के Krishna and his Gita में इसकी आलोचना की है और कहा है कि यह न तो कोई धार्मिक पुस्तक है न ही इसका कोई दार्शनिक दृष्टिकोण है. उनके अनुसार यह ब्राह्मणों द्वारा बौद्ध क्रांति का प्रति क्रांतिकारी बचाव है. समाज शास्त्री और चिंतक डॉ. कंवल भारती ने इस पुस्तक की समीक्षा में लिखा है कि महाभारत में कृष्ण जहां एक कूटनीतिक की त्सरह प्रकट होते हैं, वहीं गीता में कृष्ण का स्वरूप सर्व शक्तिमान ईश्वर का है. ताकि उनके गीता उपदेश को धार्मिक मान्यता मिल सके. इसी से पता चलता है कि गीता की रचना बाद में हुई है. कंवल भारती के अनुसार गीता का उद्देश्य चातुर्वर्ण व्यवस्था को मजबूत करना है. गीता ऋषि जैमिनी द्वारा लिखे पूर्व मीमांसा के सिद्धांतों को मजबूत करना है.
भारतीय सभ्यता के सबसे बड़े नायक
लेकिन इन सबके बावजूद कृष्ण भारतीय पुराणेतिहास के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नायक हैं. उन्होंने मनुष्य को संपूर्ण रूप दिया. उनके जीवन में कष्ट हैं, सफलता है और उनके अंदर पर्याप्त चातुर्य है. प्रेम है, काम है और शत्रु को येन-केन-प्रकरेण समाप्त कर देने की दृढ़ता भी. वे अपने मित्र के लिए कुछ भी कर सकते हैं. ऐसा व्यक्ति ही संपूर्ण है. उनकी बाल लीला, उनके प्रेम और प्रेम के प्रति उनका एकदम नया रवैया चौंकाता है. वे राधा से प्रेम करते हैं, जो दूसरे की पत्नी थीं. मज़े की बात कि उनकी पत्नी रुक्मिणी बताई जाती हैं पर कृष्ण के साथ राधा ही अपरिहार्य रूप से जुड़ी हैं. जबकि गोकुल छोड़ने के बाद वे राधा से कभी मिले नहीं. उन्होंने अपनी बहन सुभद्रा को अपने प्रेमी अर्जुन के साथ चुपचाप चले जाने के लिए उकसाया. रुक्मिणी का भी वे हरण करते हैं. द्रौपदी स्वयंवर में वे ब्राह्मण रूप धारी पांडवों का बचाव करते हैं.
अर्जुन को युद्ध की प्रेरणा
वे गीता में अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं किंतु जब-जब अर्जुन परास्त होते दिखते हैं, वे अर्जुन को झूठ और फरेब का रास्ता अपनाने की सलाह भी देते हैं. पितामह भीष्म के समक्ष शिखंडी को लाने की योजना के पीछे कृष्ण थे तो गुरु द्रोणाचार्य के समीप जा कर उनके अश्वत्थामा की मृत्यु की अफवाह उड़ाने के लिए उन्होंने भीम को लगाया. पर द्रोणाचार्य ने कहा, अश्वत्थामा को कोई भी योद्धा युद्ध में नहीं मार सकता, इसलिए जब तक सत्यवादी युधिष्ठिर इस बात की पुष्टि नहीं करेंगे तब तक वे इस बात को सच नहीं मानेंगे. अंत में अश्वत्थामा की मृत्यु के बारे में युधिष्ठिर को झूठ बोलना पड़ता है. इस वजह से लोक और परलोक में यह दाग उनके जीवन में लग गया. ज़मीन से चार अंगुल ऊपर चलने वाला उनका रथ ज़मीन से आ लगा. महाभारत पढ़ने पर कई बार लगता है कि यदि कृष्ण न होते तो पांडव कौरव से युद्ध न जीत पाते.
महाभारत युद्ध में कृष्ण की भेद नीति
कृष्ण ने पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य के बाद कर्ण को भी इसी तरह की भेद नीति से मरवाया. दुर्योधन की जंघा पर गदा मारने का इशारा उनका ही था. और इसी वज़ह से स्वयं उनके बड़े भाई बलदाऊ उनसे रुष्ट हो गए थे. लेकिन कृष्ण के पास अपने तर्क थे और एक कुशल राजनीतिक और कूटनीतिक की सोच ऐसी ही होनी चाहिए. कृष्ण के बारे में कोई भी टिप्पणी की जाए परंतु इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति में कोई दूसरा कृष्ण नहीं हुआ. जात-पात, और उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों की कितनी भी आलोचना की जाए किंतु इसका जवाब क्या होगा कि कृष्ण बौद्ध या जैन परंपरा की तरह कभी संन्यासी अथवा मुनि नहीं हुए. वे मनुष्य रूप में ही रहे और एक संपूर्ण पुरुष बनने की कोशिश की. आज भी कृष्ण उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि द्वापर में थे.
भारत के चारों कोनों में कृष्ण
आज, चार सितंबर को जन्माष्टमी है. कृष्ण जन्मोत्सव मनाने की तैयारी न सिर्फ मंदिरों में बल्कि घरों में भी खूब होती है. एक तरह से जन्माष्टमी भारत का लोकपर्व है जो उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक समान रूप से मनाया जाता है. भारत के पूर्वी तट पुरी में जगन्नाथ जी बिराजते हैं तो पश्चिम में द्वारिका है, जो कृष्ण की राजधानी रही. उत्तर में मथुरा तो दक्षिण में मदुरै जो मथुरा का ही अप्रभंश है.
