3 दशक में अमेरिका के 4 राजदूतों ने किया कश्मीर का दौरा, क्या हर बार हुआ विवाद?

किसी भी अमेरिकी राजनयिक का जम्मू-कश्मीर दौरा हमेशा से मायने रखता है. खासकर तब जब वह श्रीनगर का दौरा करे. श्रीनगर के दौरे पर भारत-पाकिस्तान की ही नहीं बल्कि दुनिया की भी नजर रहती है. अब अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर भी न सिर्फ इस केंद्र शासित प्रदेश गए बल्कि वह घाटी भी गए और श्रीनगर का दौरा किया. गोर उन चुनिंदा अमेरिकी राजनयिकों में हैं जिन्होंने श्रीनगर में अपने कदम रखे.
श्रीनगर में किसी भी अमेरिकी राजनयिक जाना इसलिए अहम होता है, क्योंकि इससे यह पता चलता है कि भारत-पाकिस्तान के बीच जारी विवाद, अलगाववादी राजनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर वॉशिंगटन किस तरह का नजरिया रख रहा है. वह भी तब जब अमेरिकी राजदूतों के घाटी दौरा विवादों की भेंट चढ़ता रहा है.
जगह खूबसूरत, यह भारत का हिस्साः गोर
राजधानी श्रीनगर में गोर ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से भी मुलाकात की. मुलाकात के बाद गोर ने कहा कि यह जगह बहुत ही खूबसूरत है और यहां आकर उन्हें खुशी हुई. साथ ही उन्होंने यह भी कहा, “जम्मू-कश्मीर भारत का अहम हिस्सा है. मैं पहली बार यहां आया हूं. जगह बेहद खूबसूरत है. इस जगह को देखकर बहुत उत्साहित हूं. हमारी आपस में बहुत अच्छी बैठक हुई. हम इस रिश्ते को आगे बढ़ाने के लिए उत्सुक हैं.”
गोर का यह दौरा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे के एक साल से कुछ अधिक समय बाद हुआ, जिसमें उनकी ओर से बार-बार यही कहा गया कि अमेरिकी कूटनीति ने मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच जारी सैन्य टकराव को खत्म करने में मदद की थी.
हालांकि नई दिल्ली ने हर बार अमेरिकी मध्यस्थता के कथित दावे को खारिज किया और कहा कि सैन्य कार्रवाई रोकने की सहमति दोनों देशों के बीच मौजूदा सैन्य चैनलों के जरिए सीधे तौर पर बनी थी.
आतंकवाद का खात्मा और अमेरिकी राजदूत
सर्जियो गोर ने इसी साल जनवरी में भारत में 27वें अमेरिकी राजदूत के तौर पर कार्यभार संभाला था और वह दक्षिण तथा मध्य एशिया के लिए वॉशिंगटन के विशेष दूत के तौर पर भी काम कर रहे हैं.
घाटी में हालात बदल चुके हैं. आतंकवाद करीब-करीब खत्म हो चुका है. ज्यादातर अलगाववादी नेता खत्म हो गए हैं या फिर नजरबंद हैं. मोदी सरकार के आने के बाद क्षेत्र में काफी बदलाव आए और यहां अमन-चैन का माहौल स्थापित होता जा रहा है. अब बदले हालात में गोर श्रीनगर आए और यहां की वादियों तथा खूबसूरती की तारीफ की, यही नहीं कश्मीर को भारत का अहम हिस्सा बताया. जबकि अतीत में कश्मीर के मसले पर वॉशिंगटन की स्थिति ढुलमुल रवैया वाला रहता था.
तब घाटी के अलगाववादी नेताओं से मुलाकात
1990 के दशक में जब घाटी में आतंकवाद अपने पैर फैला रहा था और कश्मीरी पंडित वहां से पलायन कर रहे थे. आए दिन खून-खराबा हुआ करता था. तब अमेरिकी कूटनीति समाधान निकालने की जगह कश्मीर के अलग-अलग राजनीतिक गुटों के साथ जुड़ने के लिए कहीं ज्यादा रुचि दिखाती थी.
साल 1995 में अमेरिकी राजदूत फ्रैंक विस्नर श्रीनगर के दौरे पर गए. अपने दौरे के दौरान, उन्होंने सरकारी अधिकारियों और मुख्यधारा के राजनेताओं से मुलाकात तो की ही, साथ ही कई अलगाववादी नेताओं, शिक्षाविदों, छात्रों, पत्रकारों और व्यापारिक प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की थी. उनका यह दौरा खासा विवादों में रहा था.
भारत-पाकिस्तान के बीच 1999 में कारगिल की लड़ाई के दौरान रिश्ते बेहद बिगड़ गए थे. तब वॉशिंगटन सीधे तौर पर शामिल हुआ. कारगिल जंग के दौरान, तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री (नवाज शरीफ) पर नियंत्रण रेखा (LoC) के पीछे सेना हटाने के लिए दबाव डाला था.
व्हाइट हाउस के एक रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों नेता इस बात पर राजी हो गए थे कि लड़ाई खतरनाक हो चली है और इससे व्यापक संघर्ष का खतरा मंडरा रहा है, और हमें आपस में LoC का सम्मान करना चाहिए.
9/11 हमले के बाद अमेरिकी की नीति में बदलाव
इसी बीच 2001 में अमेरिका को अपने इतिहास में सबसे बड़े आतंकवादी हमले का सामना करना पड़ा. 9/11 घटना से पहले जो अमेरिका सिर्फ संदेश देता था, वह अब आतंकवाद और सुरक्षा पर जोर देने लगा. 2002 में तत्कालीन अमेरिकी राजदूत रॉबर्ट ब्लैकविल ने कश्मीर का दौरा किया. वहां की स्थिति का जायजा लेने के लिए LoC के ऊपर उड़ान भरी और सुरक्षा संबंधी जानकारी ली. लेकिन अपने पहले के राजदूतों के उलट घाटी के अलगाववादियों से कोई मुलाकात नहीं की.
इसके बाद 2 और अमेरिकी राजदूत श्रीनगर आए, लेकिन उनके ये दौरे संस्थागत स्तर पर ही केंद्रित रहे. राजदूत टिमोथी रोमर ने यहां का दौरा किया और साल 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात की थी.
2019 में भी घाटी के दौरे पर गए राजदूत
जबकि साल 2019 में मोदी सरकार की ओर से जम्मू-कश्मीर के विशेष राज्य का दर्जा खत्म किए जाने और संवैधानिक बदलाव के बाद, जनवरी 2020 में घाटी का जायजा लेने के लिए राजदूत केनेथ जस्टर घाटी गए थे. जस्टर तब जम्मू-कश्मीर का दौरा करने वाले विदेशी राजनयिकों के एक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे.
अब घाटी के हालात बदल चुके हैं. बदले हालात में भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों में भी अहम बदलाव आए हैं. भारत का अमेरिका के साथ संबंधों में अब रक्षा, व्यापार, टेक्नोलॉजी, अहम मिनरल्स और आतंकवाद-विरोधी सहयोग शामिल हो गए हैं. नई दिल्ली अब पारंपरिक दक्षिण एशियाई प्रतिद्वंद्विता से कहीं आगे बढ़कर अमेरिका का एक अहम रणनीतिक साझेदार बन गई है.
गोर घाटी के दौरे के दौरान कश्मीर को लेकर अमेरिका की किसी नई पहल या मध्यस्थता के प्रस्ताव के साथ नहीं आए. बल्कि राजदूत ने श्रीनगर में कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा बता दिया. हालांकि इस पर पाकिस्तान ने नाराजगी दिखाई है. कुल मिलाकर घाटी को लेकर अमेरिकी की नीति में बड़े स्तर पर बदलाव के संकेत दिख रहे हैं.
