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हर दिन 16 हादसे… नाबालिगों की ड्राइविंग के चलते एक साल में 11,890 हादसे, तमिलनाडु टॉप पर

हर दिन 16 हादसे… नाबालिगों की ड्राइविंग के चलते एक साल  में 11,890 हादसे, तमिलनाडु टॉप पर

भारत में नाबालिगों की मोटर राइडिंग उनके साथ-साथ अन्य नागरिकों के लिए बड़ा खतरा बन गई है. तमाम नियम-कायदों के बावजूद नाबालिगों से जुड़े हादसों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, एक साल में 11,890 सड़क हादसे हुए, यानी औसतन करीब 16 हादसे हर दिन.

कर्नाटक हाईकोर्ट में एक केस की सुनवाई के दौरान अदालत के स्टेटमेंट के चलते नाबालिगों की व्हीकल राइडिंग से होने वाले एक्सीडेंट्स की चर्चाएं तेज हो गई है.मामला 2020 के एक दर्दनाक सड़क हादसे से जुड़ा है, जिसमें आरोप है कि 14 साल के एक नाबालिग ने अपने पिता की कार लेकर मैसूरु-बेंगलुरु हाईवे पर एक बाइक को टक्कर मार दी थी. हादसे में एक ही परिवार के 3 लोगों की मौत हो गई थी।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस मामले में नाबालिगों के वाहन चलाने को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए फैसला सुरक्षित रख लिया है. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा अगर 14 साल का बच्चा कार लेकर चला जाता है और किसी की जान चली जाती है, तो पिता की जिम्मेदारी से इनकार नहीं किया जा सकता.कोर्ट ने इसे माफ करने योग्य नहीं बताते हुए कहा कि पिता होने के नाते उसकी जिम्मेदारी बनती है कि वह 14 साल के बच्चे को कार चलाने की अनुमति न दे.

नाबालिगों से जुड़े सड़क हादसों में कौन सा राज्य नंबर वन है?

CAG की रिपोर्ट के मुताबिक साल नाबालिगों से जुड़े सड़क हादसों के मामले में तमिलनाडु सबसे आगे रहा. ये 2,063 हादसे दर्ज किए गए. इसके बाद मध्य प्रदेश में 1,138 हादसे हुए. वहीं दिल्ली में साल की शुरुआत के केवल छह सप्ताह के भीतर ही नौ नाबालिगों के खिलाफ बिना लाइसेंस गाड़ी चलाने के मामले में कार्रवाई की गई. यह पिछले साल इसी अंतराल में लगभग दोगुना था.

हाल के कुछ हादसों ने इस खतरे को और गंभीर बना दिया. कर्नाटक के होसकोटे में ट्रक से टकराने के बाद कार में सवार छह किशोरों की मौत हो गई. दिल्ली में नाबालिग चालक की SUV ने मोटरसाइकिल सवार युवक की जान ले ली. वहीं, मुंबई में भी तेज रफ्तार SUV से टक्कर के बाद स्कूटर चला रहे 15 साल के लड़के की मौत हुई. इन घटनाओं में एक बात कॉमन थी कि किसी के पास वैलिड ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था. वाहन चलाने वाले सभी नाबालिग थे.

Minor Riding

नाबालिगों द्वारा सड़क हादसों पर मनोचिकित्सक का क्या मानना है?

कई बार अपने नाबालिग बच्चों को वाहन चलाने की अनुमति देने वाले परिजनों का तर्क होता है कि, वह शारीरिक तौर पर गाड़ी संभाल सकता है. लेकिनसुरक्षित ड्राइविंग केवल हैंडल, ब्रेक और एक्सीलेटर चलाने का नाम नहीं है. इसमें तुरंत फैसला लेने, जोखिम समझने और दबाव में शांत रहने की क्षमता भी जरूरी है.

CAG की रिपोर्ट में चेन्नई की डॉक्टर गायत्री देवी के हवाले से कहा गया है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों में दिमाग का विकास जारी रहता है. निर्णय लेने, सेल्फ कंट्रोल और जोखिम समझने से जुड़ा हिस्सा शुरुआती 20 की उम्र तक पूरी तरह से मैच्योर नहीं होता.

इस दौरान नाबालिगों मेंकिशोर आवेग में फैसले लेने, आसानी से भटकने, जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास दिखाने और दोस्तों के प्रभाव में आने की आशंका रखते हैं. ऐसे मेंएक बच्चा वाहन को चला तो सकता है, लेकिन अचानक सामने आए खतरे पर सही प्रतिक्रिया देना उसके लिए मुश्किल हो सकता है.

कानून है, फिर भी सड़क पर वाहन लेकर कैसे निकल रहे नाबालिग?

इसका जवाब केवल कानून में नहीं, बल्कि समाज के रवैये में भी छिपा है. रिपोर्ट के अनुसार, कई बार माता-पिता और नाबालिग दोनों यह मानने लगते हैं कि अगर कई बार बाइक चलाने के बावजूद कुछ नहीं हुआ, तो आगे भी कोई खतरा नहीं होगा. इसे मनोविज्ञान में ऑप्टिमिज़्म बॉयस यानी मेरे साथ ऐसा नहीं होगा वाली सोच कहा जाता है.

कम स्पीड वाले वाहनों से क्यों और कैसे बढ़ा नाबालिगों के हादसों का खतरा?

  • नाबालिग राइडिंग पर बहस का एक बड़ा पहलू कम स्पीड वाले इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन है.
  • 5 किमी प्रति घंटे की अधिकतम गति वाले कुछ इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन की शर्तों से मुक्त हैं.
  • इसी तरह 50cc से कम क्षमता वाले कुछ दोपहिया वाहनों को लेकर भी अलग प्रावधान हैं.
  • एक तरफ नाबालिगों के पास सेफ ड्राइविंग के लिए जरूरी अनुभव,परिपक्वता पूरी तरह विकसित नहीं
  • दूसरी तरफ कुछ मोटराइज्ड वाहनों को बिना लाइसेंस और औपचारिक रोड सेफ्टी ट्रेनिंग के चलाने की व्यवस्था है.
  • यह दोनों व्यवस्था आपस में बहुत बड़ा विरोधाभाष पैदा करती हैं.

रिपोर्ट में आईआईटी खड़गपुर की परिवहन विशेषज्ञ डॉ. अदिति मित्रा घोष ने कहा है 50cc तक के गियरलेस स्कूटर या मोपेड चलाने वाले नाबालिगों में सीमित अनुभव, तेज ट्रैफिक में धीमे वाहन की चुनौती और आवेगपूर्ण व्यवहार, दुर्घटना का खतरा बढ़ाते हैं. 30 किमी प्रति घंटे से कम रफ्तार पर भी अचानक ब्रेक लगाने, खराब सड़क पर स्किड होने या प्रतिक्रिया में देरी से गंभीर चोट लग सकती है.

सड़क हादसों में कुल मौतों में दोपहिया वाहन सवारों की हिस्सेदारी कितनी?

MoRTH के 2023 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली कुल मौतों में दोपहिया वाहन सवारों की हिस्सेदारी 45% थी. इन वाहनों से जुड़े हादसों में 48,818 लोगों की मौत हुई, जिनमें 9,951 पैदल यात्री भी शामिल थे.लेकिन, सरकार के पास ऐसा डेटा नहीं है जिससे पता चल सके कि इन हादसों में कितने कम स्पीड या बिना लाइसेंस वाले वाहन थे और कितने चालकों की उम्र नाबालिग थी. यह पता करना मुश्किल है कि अंडरएज या अनलाइसेंस्ड ड्राइविंग का सड़क हादसों में कितना योगदान है.

गलती बच्चे की, सजा माता-पिता को क्यों मिलती है?

मोटर व्हीकल्स एक्ट के तहत नाबालिग के वाहन चलाने से जुड़े अपराध में अभिभावक या वाहन मालिक को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. अगर नाबालिग हादसे में शामिल होता है तो माता-पिता को तीन साल तक की जेल और 25 हजार रुपये तक का जुर्माना हो सकता है. चेन्नई पुलिस ने ऐसे मामलों में नाबालिगों के माता-पिता को गिरफ्तार कर रिमांड पर भेजने की कार्रवाई भी शुरू की है. यह बात भी जाननी जरूरी है कि कम क्षमता वाले या बिना लाइसेंस वाले वाहन को छूट मिलने का मतलब यह नहीं कि किसी भी उम्र का बच्चा उसे सार्वजनिक सड़क पर चला सकता है.

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