दिल्ली में DCP के 15, तो इंस्पेक्टर के 108 पद खाली… कैसे कंट्रोल होगा क्राइम?

महिलाओं की सुरक्षा हमेशा से ही देश में एक बड़ा मुद्दा रहा है. हाल के कुछ वक्तों में देशभर के अलग-अलग जगह से रेप के कई केस सामने आए, जिसने लोगों में काफी गुस्सा पैदा किया. हालांकि, इस मामले को लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट सख्त हुआ. पिछले के कुछ आंकड़ों को देखें, तो सितंबर महीने के शुरुआती 20 दिनों में देश की राजधानी में लगभग 23 रेप के केस सामने आए हैं. अब सुरक्षा के मामलों के बीच पुलिस की भर्ती से भी जुड़ी तस्वीर सामने आई है.
दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बीच पुलिस व्यवस्था से जुड़ा एक अहम आंकड़ा सामने आया है. कोर्ट में सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी ने बताया कि दिल्ली पुलिस की बीट पेट्रोलिंग यूनिट में करीब 39 फीसदी पद खाली हैं. यानी जिस व्यवस्था का काम सड़क, बाजार, पार्क और दूसरे संवेदनशील इलाकों में लगातार गश्त करना है, वहां बड़ी संख्या में पद खाली पड़े हैं.
कोर्ट ने उठाया गंभीर सवाल
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट हाल में दिल्ली-NCR में महिलाओं और नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों को लेकर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई कर रहा है. कोर्ट ने साफ कहा है कि महिलाओं को दिल्ली में रात के समय भी सुरक्षित महसूस होना चाहिए. इसके लिए सिर्फ घटना के बाद कार्रवाई करना काफी नहीं है, बल्कि अपराध होने से पहले उसे रोकना जरूरी है. कोर्ट ने पुलिस की गश्त, निगरानी, रोशनी और त्वरित कार्रवाई जैसे इंतजामों पर भी सवाल उठाए हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
- महिलाओं को रात में भी सुरक्षित महसूस होना चाहिए.
- अपराध होने के बाद कार्रवाई से ज्यादा जरूरी है उसे पहले रोकना.
- सड़कों, पार्कों और सार्वजनिक जगहों पर पुलिस की मौजूदगी बढ़ानी होगी.
- कमजोर इलाकों में निगरानी और गश्त को मजबूत करना होगा.
- सुरक्षा व्यवस्था में कमी के लिए जवाबदेही भी तय होनी चाहिए.
सुरक्षा से जुड़ी समस्या पर है ध्यान
कोर्ट की चिंता सिर्फ किसी एक घटना तक सीमित नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सड़क, पार्क, बस, मेट्रो स्टेशन और फुटओवर ब्रिज जैसी सार्वजनिक जगहें ऐसी नहीं होनी चाहिए जहां महिलाएं या बच्चे खुद को असुरक्षित महसूस करें. कोर्ट ने खराब रोशनी, कमजोर निगरानी और पर्याप्त पुलिस गश्त नहीं होने को भी सुरक्षा से जुड़ी गंभीर समस्या माना है.
39% पेट्रोलिंग स्टाफ की कमी क्यों अहम?
बीट पेट्रोलिंग का मतलब है पुलिसकर्मियों का अपने इलाके में लगातार घूमकर निगरानी रखना. इसका मकसद अपराध होने के बाद मौके पर पहुंचना ही नहीं, बल्कि अपराधियों को पहले से रोकना भी है. सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में एमिकस क्यूरी ने बताया कि बीट पेट्रोलिंग यूनिट में 39 फीसदी पद खाली हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि पेट्रोलिंग से जुड़ी योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन उन्हें जमीन पर लागू करने में कमी दिखाई देती है. यही वजह है कि पुलिस की संख्या और उसकी तैनाती दोनों अहम हो जाती हैं. अगर संवेदनशील इलाकों में पर्याप्त पुलिसकर्मी मौजूद नहीं होंगे, तो रात में गश्त, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर और किसी घटना पर तुरंत पहुंचना मुश्किल हो सकता है.
दिल्ली पुलिस में कुल कितने पद खाली हैं?
गश्ती व्यवस्था के आंकड़े के अलावा गृह मंत्रालय के आंकड़े भी दिल्ली पुलिस में खाली पदों की समस्या दिखाते हैं. सरकार का कहना है कि पुलिस में रिक्तियां रिटायरमेंट, प्रमोशन और इस्तीफे जैसे कारणों से लगातार बदलती रहती हैं और इन्हें भरने की प्रक्रिया चलती रहती है. आंकड़ों के मुताबिक, 30 नवंबर 2025 तक दिल्ली पुलिस में कुल 92,044 पद स्वीकृत हैं, जिनमें 9,248 पद खाली हैं.
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यानी करीब 10% स्वीकृत पदों पर नियुक्ति नहीं है. रैंक के हिसाब से सबसे ज्यादा रिक्तियां कांस्टेबल स्तर पर हैं. 50,946 स्वीकृत कांस्टेबल पदों में 4,591 खाली हैं. हेड कांस्टेबल के 23,724 पदों में 3,057 पद रिक्त हैं. सब-इंस्पेक्टर के 8,087 पदों में 1,039 खाली हैं.
पुलिस में सबसे बड़ी कमी
एएसआई के 7,320 स्वीकृत पदों में 300 पद खाली हैं, जबकि इंस्पेक्टर के 1,453 पदों में 108 रिक्त हैं. एसीपी के 346 पदों में 125 खाली हैं. वहीं अतिरिक्त डीसीपी के 54 पदों में 15 और डीसीपी के कनिष्ठ प्रशासनिक श्रेणी (जेएजी) के 60 पदों में 13 पद रिक्त हैं. आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली पुलिस में सबसे बड़ी कमी कांस्टेबल और हेड कांस्टेबल स्तर पर है.
आंकड़ों के मुताबिक:
- कांस्टेबल के 50,946 पदों में 4,591 खाली थे.
- हेड कांस्टेबल के 23,724 पदों में 3,057 खाली थे.
- सब-इंस्पेक्टर के 8,087 पदों में 1,039 खाली थे.
- इंस्पेक्टर के 1,453 पदों में 108 पद खाली थे.
- ACP के 346 पदों में 125 पद खाली थे.

असली समस्या सिर्फ पुलिस की संख्या है?
यहां मामला सिर्फ खाली पदों तक सीमित नहीं है. सुप्रीम कोर्ट की चिंता का एक बड़ा हिस्सा यह है कि जो सुरक्षा व्यवस्था पहले से बनाई गई है, वह जमीन पर कितनी प्रभावी है. एमिकस क्यूरी ने सुनवाई के दौरान बीट पेट्रोलिंग को लेकर प्रशासनिक कमी की बात उठाई.
उन्होंने दिल्ली पुलिस की शिष्टाचार एंटी-ईव टीजिंग स्क्वॉड का भी जिक्र किया और कहा कि संवेदनशील जगहों की पहचान कर वहां सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है.
यानी सिर्फ पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा. यह भी देखना होगा कि उन्हें कहां तैनात किया जा रहा है, संवेदनशील इलाकों में कितनी गश्त हो रही है और शिकायत मिलने पर पुलिस कितनी जल्दी पहुंचती है.
कोर्ट की नजर में जवाबदेही भी जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ चिंता जताना या घटना के बाद बयान देना पर्याप्त नहीं है. सुरक्षा व्यवस्था में जहां कमी है, वहां जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. कोर्ट ने सार्वजनिक जगहों को सुरक्षित बनाने के लिए ठोस और मापने योग्य कदम उठाने पर जोर दिया है. इसमें पर्याप्त रोशनी, CCTV और निगरानी, नियमित पेट्रोलिंग और किसी घटना पर तुरंत पुलिस पहुंचना जैसे कदम शामिल हो सकते हैं. खास तौर पर रात के समय महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर इन व्यवस्थाओं की अहमियत और बढ़ जाती है.
