बहुमत के करीब PM लक्सन, फिर भी न्यूजीलैंड में सरकार गठन में देरी क्यों?

न्यूजीलैंड में आम चुनाव के बाद नई सरकार बनाने में कई हफ्ते लग सकते हैं. प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन की पार्टी और उसके सहयोगी दलों को बहुमत मिलता दिख रहा है, लेकिन अभी कुछ वोटों की गिनती बाकी है. इन वोटों से चुनाव का पूरा नतीजा बदल सकता है. इसलिए देश में नई सरकार को लेकर अभी स्थिति साफ नहीं है. चुनाव आयोग के शुरुआती नतीजों के मुताबिक, लक्सन की नेशनल पार्टी और उसके सहयोगी दल ACT और न्यूजीलैंड फर्स्ट को 131 सदस्यों वाली संसद में 67 सीटें मिलने का अनुमान है. सरकार बनाने के लिए 66 सीटों की जरूरत है. यानी गठबंधन बहुमत के आंकड़े से सिर्फ एक सीट आगे है.
हालांकि, अभी करीब 14% वोटों की गिनती बाकी है. इनमें विदेश में रहने वाले न्यूजीलैंड के नागरिकों और अपने चुनाव क्षेत्र से बाहर वोट डालने वाले लोगों के वोट शामिल हैं. पिछले चुनावों में इन वोटों का रुझान वामपंथी दलों की तरफ रहा है. चुनाव आयोग 27 नवंबर को अंतिम नतीजे घोषित करेगा.
अंतिम नतीजों तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहेंगे लक्सन
नई सरकार बनने तक क्रिस्टोफर लक्सन कार्यवाहक प्रधानमंत्री के तौर पर काम करेंगे. चुनाव के बाद न तो लक्सन और न ही विपक्षी लेबर पार्टी के नेता क्रिस हिपकिंस ने जीत का दावा किया. चुनाव में अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार और महंगाई बड़ा मुद्दा रहे. लक्सन ने कहा कि चुनाव बहुत करीबी रहा है. अगले तीन हफ्तों तक यह साफ नहीं होगा कि सरकार किसकी बनेगी. हालांकि, मौजूदा आंकड़ों के आधार पर उन्हें अपने पुराने सहयोगियों के साथ फिर सरकार बनाने की उम्मीद है.
नई पार्टी बन सकती है सरकार बनाने में अहम
अगर अंतिम नतीजों में लक्सन का गठबंधन बहुमत से पीछे रह जाता है, तो उसे या विपक्षी गठबंधन को सेंटरिस्ट ऑपर्च्युनिटी पार्टी का समर्थन लेना पड़ सकता है. यह पार्टी पहली बार संसद पहुंच सकती है. लक्सन पहले इस पार्टी के साथ गठबंधन से इनकार करते रहे हैं, लेकिन अब उन्होंने अपना रुख बदलते हुए कहा है कि उसके साथ संबंध बनाना उचित होगा. विक्टोरिया यूनिवर्सिटी की पॉलिटकल साइंस की सीनियर प्रोफेसर मोना क्रेवेल ने भी दोनों दलों के साथ आने की संभावना जताई है. उनके मुताबिक, ऑपर्च्युनिटी पार्टी का रुख बीच का और व्यावहारिक है.
नेशनल और लेबर को 30% से कम वोट
न्यूजीलैंड में 1996 से चुनाव की ऐसी व्यवस्था है, जिसमें वोटर पार्टी और अपने क्षेत्र के उम्मीदवार, दोनों को वोट देते हैं. संसद में 71 सीटें सीधे चुनाव क्षेत्र से और 60 सीटें पार्टियों को मिले वोट के आधार पर तय होती हैं.
इस बार नेशनल पार्टी और लेबर पार्टी, दोनों को 30% से कम वोट मिले हैं. 1996 में यह व्यवस्था शुरू होने के बाद दोनों का यह सबसे खराब प्रदर्शन है. पॉलिटिकल कमेंटेटर बेन थॉमस के मुताबिक, इस बार संसद में पार्टियों को मिले कुल वोट और सीटों के बीच अंतर ज्यादा हो सकता है. इसकी वजह चुनाव क्षेत्र की सीटों से जुड़े नियम और रणनीतिक मतदान है.
नेशनल पार्टी को कम वोट मिलने के कारण वित्त मंत्री निकोला विलिस समेत उसके कई सीनियर नेता अगली संसद में जगह नहीं बना पाएंगे. विलिस अगले चार हफ्ते तक अपने पद पर बनी रहेंगी. नेशनल पार्टी के नेता सिमोन ब्राउन ने नतीजों को खुशी और निराशा, दोनों से भरा बताया.
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