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BRICS की नई करेंसी क्या है? क्या डॉलर का दबदबा खत्म हो सकता है?

क्या BRICS देश मिलकर एक नई करेंसी लॉन्च करने वाले हैं? क्या आने वाले समय में डॉलर की जगह BRICS की कोई नई मुद्रा ले सकती है? और अगर ऐसा हुआ तो भारत, चीन, रूस और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ेगा?

ये सवाल पिछले कुछ समय से लगातार चर्चा में हैं।

लेकिन सबसे पहले एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है—अभी तक BRICS ने कोई साझा नई करेंसी लॉन्च नहीं की है। BRICS में साझा मुद्रा बनाने की चर्चा और अटकलें जरूर रही हैं, लेकिन आधिकारिक स्तर पर तत्काल कोई एकल BRICS मुद्रा लागू करने का फैसला नहीं हुआ है। 2025 में ब्राजील की BRICS अध्यक्षता के दौरान भी BRICS Sherpa Mauricio Lyrio ने स्पष्ट किया था कि साझा मुद्रा उस समय एजेंडे में नहीं थी। इसके बजाय समूह का ध्यान व्यापार और वित्तीय लेन-देन की लागत कम करने तथा स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल पर था।

तो फिर BRICS वास्तव में क्या करना चाहता है? आइए आसान भाषा में समझते हैं।

BRICS की नई करेंसी क्या है?

सीधी भाषा में कहें तो फिलहाल BRICS की कोई नई आधिकारिक साझा करेंसी मौजूद नहीं है।

सोशल मीडिया और इंटरनेट पर समय-समय पर BRICS की संभावित नई मुद्रा के नाम, डिजाइन और नोटों की तस्वीरें वायरल होती रही हैं। लेकिन ऐसी तस्वीरों और दावों को आधिकारिक घोषणा नहीं माना जाना चाहिए।

BRICS का वर्तमान आर्थिक एजेंडा एक साझा नोट या सिक्का जारी करने के बजाय स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान और वित्तीय सहयोग को बढ़ाने पर अधिक केंद्रित है।

फिर BRICS डॉलर पर निर्भरता क्यों कम करना चाहता है?

अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर की भूमिका बहुत बड़ी है। कई देशों के बीच व्यापार, कमोडिटी खरीद और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेन-देन में डॉलर का इस्तेमाल होता है।

BRICS देशों का एक उद्देश्य यह है कि सदस्य देश आपस में व्यापार करते समय हर लेन-देन के लिए डॉलर पर निर्भर न रहें।

उदाहरण के लिए, अगर भारत और किसी अन्य BRICS देश के बीच व्यापार हो रहा है, तो भविष्य में स्थानीय मुद्राओं और बेहतर भुगतान प्रणालियों के जरिए लेन-देन को आसान और कम खर्चीला बनाने की कोशिश की जा सकती है।

इसका मतलब यह नहीं है कि डॉलर को तुरंत खत्म किया जा रहा है।

BRICS की रणनीति: नई करेंसी से ज्यादा महत्वपूर्ण पेमेंट सिस्टम

BRICS के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र Cross-Border Payments है।

BRICS देशों ने सीमा-पार भुगतान को अधिक तेज, सस्ता और सुविधाजनक बनाने के विकल्पों पर काम आगे बढ़ाने की बात की है। 2026 में भारत की अध्यक्षता के दौरान सदस्य देशों की डिजिटल करेंसी और भुगतान प्रणालियों को जोड़ने की संभावना भी चर्चा में है।

यानी आने वाले समय में बड़ा बदलाव केवल “नई BRICS करेंसी” नहीं, बल्कि यह हो सकता है कि अलग-अलग देशों की अपनी मुद्राओं में अंतरराष्ट्रीय भुगतान करना आसान हो जाए।

BRICS में Digital Currency का क्या रोल है?

दुनिया भर में केंद्रीय बैंक अपनी-अपनी Central Bank Digital Currency यानी CBDC पर काम कर रहे हैं।

भारत के पास Digital Rupee, चीन के पास e-CNY और कई अन्य देशों में भी डिजिटल मुद्रा से जुड़े प्रोजेक्ट हैं।

2026 में भारत BRICS के भीतर CBDC और डिजिटल भुगतान प्रणालियों की interoperability यानी अलग-अलग प्रणालियों के बीच बेहतर कनेक्शन को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

अगर ऐसी व्यवस्था सफल होती है, तो भविष्य में अलग-अलग BRICS देशों के बीच भुगतान अधिक तेजी से हो सकता है।

क्या BRICS की करेंसी डॉलर की जगह ले सकती है?

यह सवाल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।

निकट भविष्य में डॉलर को पूरी तरह बदल देना बेहद मुश्किल दिखाई देता है।

क्यों?

क्योंकि डॉलर की ताकत केवल अमेरिकी करेंसी होने की वजह से नहीं है। इसके पीछे विशाल अमेरिकी वित्तीय बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में इसकी व्यापक भूमिका, डॉलर में उपलब्ध वित्तीय परिसंपत्तियां और वैश्विक भुगतान व्यवस्था का लंबा इतिहास है।

इसलिए BRICS का स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाना और डॉलर को पूरी तरह समाप्त कर देना—दो अलग बातें हैं।

क्या डॉलर का दबदबा कम हो सकता है?

हां, कुछ क्षेत्रों में डॉलर पर निर्भरता कम हो सकती है।

BRICS देशों का बढ़ता आर्थिक आकार और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की कोशिश अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था को धीरे-धीरे अधिक बहुध्रुवीय बना सकती है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अगले कुछ वर्षों में डॉलर अचानक दुनिया की प्रमुख मुद्रा नहीं रहेगा।

एक अधिक संभावित स्थिति यह है कि भविष्य में दुनिया में कई मजबूत भुगतान और वित्तीय विकल्प मौजूद हों—डॉलर के साथ यूरो, युआन, स्थानीय मुद्राएं और अन्य व्यवस्थाएं।

भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

भारत के लिए BRICS की भुगतान व्यवस्था कई कारणों से महत्वपूर्ण हो सकती है।

1. व्यापार की लागत कम हो सकती है

अगर दो देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार संभव हो, तो हर लेन-देन में डॉलर खरीदने और बदलने की जरूरत कम हो सकती है।

2. सीमा-पार भुगतान आसान हो सकता है

तेज और interoperable payment systems से अंतरराष्ट्रीय भुगतान को अधिक सुविधाजनक बनाने की कोशिश की जा सकती है।

3. डॉलर पर निर्भरता में विविधता

भारत किसी एक मुद्रा या भुगतान प्रणाली पर अत्यधिक निर्भर रहने के बजाय कई विकल्पों के साथ काम कर सकता है।

4. डिजिटल भुगतान में भारत की भूमिका

भारत का UPI और डिजिटल भुगतान का अनुभव BRICS देशों के बीच डिजिटल भुगतान सहयोग में उपयोगी हो सकता है।

BRICS Pay क्या है?

BRICS Pay नाम से एक संभावित भुगतान व्यवस्था की चर्चा लंबे समय से होती रही है। इसका व्यापक विचार यह है कि BRICS देशों के बीच भुगतान को अधिक आसान बनाया जाए और मौजूदा वित्तीय प्रणालियों के साथ वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था विकसित की जाए।

हालांकि, इसे किसी आधिकारिक BRICS “नई मुद्रा” के रूप में समझना सही नहीं होगा।

वर्तमान BRICS एजेंडा में सीमा-पार भुगतान प्रणालियों की interoperability और स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन को बढ़ाने पर जोर है।

क्या BRICS एक साझा करेंसी बना सकता है?

सैद्धांतिक रूप से भविष्य में ऐसी संभावना पर चर्चा हो सकती है, लेकिन एक साझा मुद्रा बनाना बहुत जटिल प्रक्रिया होगी।

इसके लिए सदस्य देशों को कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमत होना पड़ेगा:

  • कौन केंद्रीय बैंक जैसी भूमिका निभाएगा?
  • मुद्रा की कीमत कैसे तय होगी?
  • महंगाई को कैसे नियंत्रित किया जाएगा?
  • अलग-अलग देशों की मौद्रिक नीतियों में तालमेल कैसे होगा?
  • व्यापार घाटे और अधिशेष को कैसे संभाला जाएगा?
  • मुद्रा की सुरक्षा और स्थिरता कैसे सुनिश्चित होगी?

BRICS के सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाएं और आर्थिक नीतियां एक-दूसरे से काफी अलग हैं। इसलिए एक साझा मुद्रा बनाना आसान नहीं होगा।

BRICS के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां

BRICS का विस्तार होने के साथ इसका प्रभाव बढ़ा है, लेकिन साथ ही चुनौतियां भी बढ़ी हैं।

सदस्य देशों के राजनीतिक और आर्थिक हित हमेशा एक जैसे नहीं होते। भारत और चीन के बीच भी कई रणनीतिक और आर्थिक मतभेद हैं।

इसके अलावा, अलग-अलग देशों की वित्तीय प्रणालियों को जोड़ने के लिए तकनीकी, नियामकीय और राजनीतिक स्तर पर काफी समन्वय की जरूरत होगी। Reuters के अनुसार, 2026 में डिजिटल भुगतान प्रणालियों को जोड़ने की कोशिशों के सामने राजनीतिक और तकनीकी बाधाएं भी मौजूद हैं।

BRICS और डॉलर का भविष्य

यह कहना जल्दबाजी होगी कि BRICS डॉलर को खत्म कर देगा।

ज्यादा वास्तविक संभावना यह है कि BRICS वैश्विक भुगतान और व्यापार में विकल्पों की संख्या बढ़ाने की दिशा में काम करे।

अगर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां सफल होती हैं, तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की हिस्सेदारी कुछ क्षेत्रों में कम हो सकती है।

लेकिन डॉलर के वैश्विक महत्व को समाप्त करना एक बहुत लंबी और कठिन प्रक्रिया होगी।

क्या आम आदमी पर इसका असर पड़ेगा?

पहली नजर में BRICS की मुद्रा या अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था एक बहुत बड़ा आर्थिक विषय लगता है, लेकिन इसका असर आम लोगों तक भी पहुंच सकता है।

भविष्य में अगर सीमा-पार भुगतान सस्ता और आसान होता है, तो:

  • अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने वाली कंपनियों को फायदा हो सकता है।
  • आयात-निर्यात की लागत में बदलाव आ सकता है।
  • विदेशों में भुगतान करना आसान हो सकता है।
  • डिजिटल पेमेंट के नए विकल्प विकसित हो सकते हैं।
  • भारतीय कंपनियों के लिए कुछ बाजारों में व्यापार करना आसान हो सकता है।

हालांकि, इसका असर कितना और कितनी जल्दी होगा, यह आने वाले वर्षों में होने वाले फैसलों पर निर्भर करेगा।

निष्कर्ष: क्या डॉलर का युग खत्म होने वाला है?

नहीं, अभी ऐसा कहना सही नहीं होगा।

BRICS की कोई आधिकारिक साझा नई करेंसी वर्तमान में लॉन्च नहीं हुई है। BRICS का वास्तविक फोकस स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान और वित्तीय सहयोग को मजबूत करने पर है।

अगर BRICS देशों के बीच वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था सफल होती है, तो इससे दुनिया की वित्तीय व्यवस्था अधिक बहुध्रुवीय हो सकती है और कुछ क्षेत्रों में डॉलर पर निर्भरता कम हो सकती है।

लेकिन डॉलर को पूरी तरह हटाना अलग और कहीं अधिक कठिन चुनौती है।

इसलिए आने वाले समय की सबसे बड़ी कहानी शायद “BRICS की नई करेंसी” नहीं, बल्कि “BRICS द्वारा बनाए जा रहे नए भुगतान विकल्प” होंगे।

और 2026 में भारत की BRICS अध्यक्षता के दौरान डिजिटल भुगतान और सदस्य देशों की वित्तीय प्रणालियों के बीच बेहतर कनेक्टिविटी पर होने वाली चर्चा इस बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत दे सकती है।

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