News

3.5 लाख करोड़ रुपये…NEET-JEE कोचिंग का खर्च कैसे शिक्षा विभाग के बजट पर भारी? राहुल गांधी ने उठाए सवाल

3.5 लाख करोड़ रुपये…NEET-JEE कोचिंग का खर्च कैसे शिक्षा विभाग के बजट पर भारी? राहुल गांधी ने उठाए सवाल

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कोचिंग इंडस्ट्री और सरकार को एक साथ घेरा है. उन्होंने कहा कि अकेले नीट देने वाले 22 लाख स्टूडेंट्स ने 1.32 लाख करोड़ रुपये एक साल में खर्च किया है. उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार का शिक्षा का कुल सालाना बजट इतना नहीं है. उनके इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अलग से करना जरूरी है लेकिन यह बात तो तय है कि देश में कोचिंग इंडस्ट्री ने बड़ा रूप ले लिया है. सिविल सर्विसेज, नीट, इंजीनियरिंग, एसएससी, बैंकिंग, रेलवे, सेना में भर्ती आदि के लिए अब अलग-अलग कोचिंग संस्थान देश के शहरों में उपलब्ध हैं.

आइए, राहुल गांधी के हमले के बहाने समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर वाकई कोचिंग इंडस्ट्री कितनी बड़ी है? कैसे देश में नीट, जेईई, यूपीएससी, एसएससी, बैंकिंग, रेलवेज, सेना की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए चलने वाली कोचिंग इंडस्ट्री आज एक समानांतर शिक्षा व्यवस्था बन चुकी है?

कितना बड़ा है कोचिंग का बाजार?

भारत में कोचिंग इंडस्ट्री का अनुमानित मौजूदा बाजार लगभग 58-65 हजार करोड़ रुपये आंका गया है. ईमार्क ग्रुप समेत कुछ अन्य एजेंसियां कहती हैं कि कोचिंग इंडस्ट्री 10.3 प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ रही है. साल 2034 तक इसके 1.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है. कुछ स्वतंत्र विश्लेषण और मीडिया रिपोर्ट्स का दावा है कि अगर छोटे-बड़े सभी कोचिंग सेंटर्स और ट्यूशन को शामिल करें, तो छात्र और उनके परिवार प्रति वर्ष प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाओं पर लगभग 3.5 लाख करोड़ रुपये खर्च कर रहे हैं. इन आंकड़ों की पुष्टि भले न की जा सके लेकिन यह रकम इतना तो पुख्ता करती है कि मामला करोड़ों में है. और सरकारी शिक्षा व्यवस्था बेहद लचर है.

Rahul Gandhi (3)

राहुल गांधी ने उठाए सवाल.

शिक्षा विभाग के बजट से कितना है फासला?

भारत सरकार के केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का वित्त वर्ष 2025-26 का बजट लगभग 1,28,650 करोड़ रुपये है. इसमें स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा दोनों का बजट शामिल है. अगर दोनों की तुलना की जाए तो स्पष्ट है कि केन्द्रीय बजट में और कोचिंग के अनुमानित बजट में कई गुना का अंतर है. यह आंकड़ा चौंकाने वाला है. क्योंकि यह दर्शाता है कि भारतीय अभिभावक सरकारी शिक्षा व्यवस्था की तुलना में कोचिंग पर लगभग तीन गुना अधिक पैसा अपनी जेब से खर्च कर रहे हैं. यह समानांतर शिक्षा प्रणाली असल बजट पर भारी पड़ रही है.

एक बच्चे पर कितना आता है खर्च?

कोचिंग का खर्च परीक्षा की प्रकृति और संस्थान के शहर पर निर्भर करता है. फिर भी औसतन एक छात्र का खर्च कुछ इस प्रकार माना जा सकता है.

  • नीट और जेईई: राजस्थान के कोटा जैसे कोचिंग हब में एक बच्चे की सालाना फीस एक लाख से 2.5 लाख रुपये के बीच होती है. अगर इसमें रहने, खाने और हॉस्टल का खर्च जोड़ दें, तो यह प्रति वर्ष 3.5 लाख से 5 लाख रुपये तक पहुंच जाता है.
  • यूपीएससी: दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर या मुखर्जी नगर में एक छात्र की औसत कोचिंग फीस 1.5 लाख से 2 लाख रुपये सालाना है. रहने के खर्च के साथ एक साल की तैयारी छात्र को 4 से 5 लाख रुपये की पड़ती है.
  • एसएससी और बैंकिंग: इन परीक्षाओं की तैयारी तुलनात्मक रूप से सस्ती है. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर यह पाँच से 20 हजार तक में उपलब्ध है. इनकी ऑफलाइन कोचिंग में 30 से 60 हजार रुपये सालाना तक खर्च होते हैं.
Rahul Gandhi (4)

कोटा में राहुल गांधी ने उठाए सवाल.

किस राज्य के बच्चे खर्च करते हैं सबसे ज्यादा?

खर्च करने के मामले में बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्य सबसे आगे हैं. इसका कारण इन राज्यों में सरकारी नौकरियों की भारी मांग और मेडिकल, इंजीनियरिंग के प्रति जुनून है. नियोजित खर्च के मामले में कोटा और दिल्ली मुख्य केंद्र हैं जहां छात्र दूसरे राज्यों से आकर पैसा निवेश करते हैं. उत्तर भारत के हर राज्य की राजधानी एवं बड़े शहर में भी कोचिंग चल रही हैं. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बच्चे भी दक्षिण भारत में जेईई और नीट कोचिंग पर भारी निवेश करते हैं.

आंकड़ों में कोचिंग संस्थान और उनका दबदबा

कोचिंग इंडस्ट्री अब केवल छोटे कमरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बड़े कॉर्पोरेट घरानों का व्यवसाय बन गई है. कुछ उदाहरण देख सकते हैं. नमूने के रूप में उपलब्ध ये आंकड़े यह बताने को काफी हैं कि कोचिंग इंडस्ट्री अब काफी बड़ी हो चली है.

  • आकाश एजुकेशन: इसकी वैल्यू अरबों में है. यह मेडिकल कोचिंग की सबसे बड़ी कंपनी है. देश भर में इसके केंद्र हैं. आकाश को जब बायजूज ने खरीद था तब उसकी वैल्यू 7300 करोड़ रुपये आंकी गई थी.
  • फिजिक्स वाला: अलख पांडे की इस एडटेक कंपनी ने कोचिंग को सस्ता बनाकर पूरे बाजार को हिला दिया है. फिर भी विद्यापीठ नाम से इनका ऑफलाइन विस्तार तेजी से बढ़ा है. एक यूनिकॉर्न स्टार्टअप के रूप में इसका मूल्यांकन 1.1 बिलियन डॉलर से अधिक है. वित्तीय वर्ष 2023 में इसका रेवेन्यू लगभग 780 करोड़ रुपये बताया गया है.
  • वाजीराम एंड रवि, विजन आईएएस: यूपीएससी के क्षेत्र में इन संस्थानों का सालाना रेवेन्यू करोड़ों में है. अकेले दिल्ली के चोटी के 5-6 संस्थान इस बाजार के 40 फीसदी हिस्से पर कब्जा रखते हैं.
  • एलेन करियर इंस्टीट्यूट: कोटा स्थित यह संस्थान देश के अनेक हिस्सों तक अपनी पहुंच रखता है. इसकी पहुंच लाखों स्टूडेंट्स तक है. कहा जाता है कि इसका वार्षिक राजस्व कई हजार करोड़ का है.

प्रामाणिक रिपोर्ट्स भी करती हैं पुष्टि

कोचिंग इंडस्ट्री पर कई वैश्विक और स्थानीय रिपोर्ट इसके विस्तार की पुष्टि करती हैं. टेकनावियो की रिपोर्ट कहती है कि भारत में टेस्ट प्रिपरेशन मार्केट 2030 तक कई बिलियन डॉलर की वृद्धि करेगा. इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली की एक स्टडी बताती है कि कोचिंग अब केवल अतिरिक्त मदद नहीं बल्कि शिक्षा का मुख्य हिस्सा बन चुकी है, जिससे शैक्षणिक असमानता बढ़ रही है. सांख्यिकी मंत्रालय के पुराने सर्वे भी बताते हैं कि भारत में 25 फीसदी से अधिक छात्र निजी कोचिंग ले रहे हैं, और शहरी इलाकों के कुछ राज्यों में यह आंकड़ा 50 फीसदी से भी ज्यादा है.

सरल शब्दों में कहें तो कोचिंग इंडस्ट्री आज एक ऐसी अनिवार्य ज़रूरत बन गई है जो मध्यम वर्ग की बचत का बड़ा हिस्सा सोख रही है. जहाँ सरकारी बजट का लक्ष्य बुनियादी ढांचा सुचारू करना है, वहीं निजी कोचिंग इंडस्ट्री परिणाम बेचने के वादे पर फल-फूल रही है. यह अंतर भविष्य की शिक्षा नीति के लिए एक बड़ी चुनौती है. सरकार को सोचना होगा कि अगर हमारी शिक्षा व्यवस्था में सब कुछ दुरुस्त है तो आखिर स्टूडेंट्स को इन कोचिंग संस्थानों की जरूरत पड़ क्यों रही है?

यह भी पढ़ें: राजनीति में राहुल गांधी की चुनौतियां नेहरू-इंदिरा से कठिन क्यों?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *